3 मंजिल की अनुमति, 5 मंजिल का निर्माण! सत्य निकेतन हादसे ने उठाए बड़े सवाल
जहां चार गज की जगह मिली, वहां एक कमरा बना दिया... जहां दो-मंजिला घर था, उसे नियमों की धज्जियां उड़ाकर पांच-पांच मंजिला पीजी, हॉस्टल या रेस्टोरेंट बना दिया! जी हां यह कहानी किसी एक गली की नहीं, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली की उस खौफनाक हकीकत की है, जहां मौत के ये 'मकड़जाल' इंसानी जिंदगियों पर भारी पड़ रहे हैं। सत्य निकेतन में 40-50 साल पुरानी इमारत के ढहने से अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है और मलबे से जिंदगियों को तलाशने का काम जारी है। हर हादसे के बाद FIR होती है, कुछ दिन बुलडोजर का शोर मचता है, सीलिंग का ड्रामा होता है और फिर सब कुछ उसी पुराने ढर्रे पर लौट आता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि इन इमारतों के कमजोर होने का इंतजार क्यों किया जाता है? किसी हादसे का इंतजार क्यों? किसी की जान जाने का इंतजार क्यों? आपको बता दें सत्य निकेतन की जो बिल्डिंग ताश के पत्तों की तरह ढह गई, वह 40-50 साल पुरानी थी। नियमों के मुताबिक यहां केवल तीन मंजिल की अनुमति थी, लेकिन लालच में इसे पांच मंजिल तक अवैध खड़ा कर दिया गया था। हादसे वाले दिन ग्राउंड फ्लोर पर रेनोवेशन और तोड़फोड़ का काम चल रहा था, जिसने कमजोर हो चुके स्ट्रक्चर की नीवों को हिलाकर रख दिया। इतना ही नहीं, इस गिरी हुई इमारत के बगल वाली बिल्डिंग का हाल भी उतना ही खौफनाक है कि वह भी एक तरफ झुकी हुई है और उसे लोहे के खंभों के सहारे जैसे-तैसे टिकाया गया है!
हादसे के बाद नींद से जागे प्रशासन ने दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 348 में नोटिस थमाकर तीन दिन के भीतर उस झुकी हुई बिल्डिंग को भी ध्वस्त करने का फरमान जारी कर दिया है। पुलिस ने मकान मालिक हरिराम और अन्य लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया है। वहीं अगर कागजों में लिखे नियमों को देखें तो दिल्ली में किसी भी इमारत को मौत का कुआं बनने से रोकने के लिए कड़े प्रावधान हैं। दरअसल, दिल्ली में बिल्डिंग निर्माण से जुड़े नियमों का फ्रेमवर्क DDA तैयार करता है। यह प्लॉट के साइज, सामने की सड़क की चौड़ाई और अलॉटेड फ्लोर एरिया रेशियो के आधार पर तय होती है। वहीं नक्शा पास होने और निर्माण पूरा होने के बाद MCD अधिकारी मौके की तस्वीरें और निर्माण की गुणवत्ता जांचकर ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट जारी करते हैं।
साथ ही स्ट्रक्चरल सेफ्टी सर्टिफिकेट भी जरूरी होता है जो बताता है कि इमारत भूकंप और भार सहने में सक्षम है। नियमों के मुताबिक, MCD का यह फर्ज है कि वह पुरानी और जर्जर इमारतों की लगातार निगरानी करे और खतरनाक पाई जाने वाली इमारतों को खाली कराने या गिराने का नोटिस दे। ऐसे में सवाल है कि जब नियम इतने सख्त हैं, तो 50 साल पुरानी तीन-मंजिला इमारत पर पांच मंजिलें कैसे खड़ी हो गईं? ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के बाद लगातार अवैध निर्माण और पीजी का कारोबार किसकी सरपरस्ती में चलता रहा? क्या बिना स्थानीय निगम कर्मचारियों और अधिकारियों की मिलीभगत के इतनी संकरी गलियों में लोहे के पिलर पर इमारतें टिक सकती हैं?
सत्य निकेतन का हादसा केवल एक बिल्डिंग का गिरना नहीं, बल्कि व्यवस्था के उस भ्रष्टाचार का उजागर होना है जो चंद पैसों के लालच में इंसानी जानों की बलि चढ़ा देता है। सत्य निकेतन की गलियों में फैला मलबा और सिसकती सांसें आज पूरी दिल्ली से एक ही सवाल पूछ रही हैं कि आखिर कब तक अवैध निर्माण और भ्रष्ट व्यवस्था का यह खूनी खेल चलता रहेगा? हर हादसे के बाद FIR का पर्चा दर्ज हो जाता है, मुआवजे का ऐलान होता है और 3 दिन में बुलडोजर चलाने का नोटिस चिपका दिया जाता है। लेकिन असली गुनहगार वे अफसर और सिस्टम के नुमाइंदे हैं जो नियमों की अनदेखी कर इन इमारतों को मौत का जाल बनने देते हैं। जब तक पुरानी और अवैध इमारतों का कड़ाई से ऑडिट नहीं होगा और लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक दिल्ली की संकरी गलियों में हर उठती हुई नई मंजिल किसी मासूम की जिंदगी के लिए खतरा बनी रहेगी।
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