पोस्टर से डर गई सत्ता? दिल्ली मेट्रो में उठे सवाल तो दर्ज हुई FIR, जांच में जुटी स्पेशल सेल

नई दिल्ली: किसी लोकतंत्र की मजबूती इस बात से मापी जाती है कि उसकी सरकार अपने नागरिकों की आलोचनाओं और सवालों को कितनी सहजता से स्वीकार करती है। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली से आया ताजा मामला एक अलग ही तस्वीर पेश कर रहा है। दिल्ली मेट्रो की एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन में सरकार के प्रदर्शन पर सवाल खड़े करते दो पोस्टर क्या मिले, पूरी सरकार और पुलिस महकमा हरकत में आ गया। अज्ञात लोगों पर एफआईआर ठोक दी गई और मामले की जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को सौंप दी गई। यह पूरी कार्रवाई यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज सत्ता में बैठी बीजेपी सरकार जनता के सीधे सवालों का सामना करने से इस कदर घबरा रही है कि हर पोस्टर और हर सवाल पर मुकदमे दर्ज करने की नौबत आ गई है?

एयरपोर्ट मेट्रो में लगे पोस्टर, दर्ज हुआ मुकदमा

दिल्ली पुलिस के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, एयरपोर्ट एक्सप्रेस लाइन की मेट्रो ट्रेन के भीतर दो पोस्टर चिपकाए गए थे, जिनमें सरकार के कामकाज और वादों पर तीखे सवाल पूछे गए थे। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए पोस्टरों को हटाया और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तथा मेट्रो संचालन अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज कर लिया। किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकार के खिलाफ पोस्टर लगाना या पर्चे बांटना विरोध दर्ज कराने का एक सामान्य और शांतिपूर्ण जरिया माना जाता रहा है। परंतु, इस मामले में जिस तरह से एफआईआर दर्ज कर जांच की कमान स्पेशल सेल को सौंपी गई, उससे साफ जाहिर होता है कि सत्ता तंत्र असहमति के हर स्वर को अपराध की श्रेणी में खड़ा करना चाहता है।

सवाल उठाने वालों को 'साजिशकर्ता' साबित करने की कसरत

घटना के बाद पुलिस प्रशासन के पूर्व अधिकारियों और जांच एजेंसियों द्वारा इसे किसी 'बड़ी राजनीतिक साजिश' के रूप में पेश किया जा रहा है। दिल्ली पुलिस के पूर्व डीसीपी एलएन राव के अनुसार, यह कोई सामान्य घटना नहीं बल्कि एक सोची-समझी साजिश का नतीजा है। पुलिस अब इस बात की पड़ताल में जुटी है कि इन पोस्टरों को लगाने का मुख्य एजेंडा क्या था और इसके पीछे कौन से संगठन या व्यक्ति शामिल हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सरकार से उसके रिपोर्ट कार्ड पर सवाल पूछना कोई 'साजिश' है? क्या देश का नागरिक अपनी चुनी हुई सरकार से उसके प्रदर्शन पर हिसाब नहीं मांग सकता?

हर सवाल पर FIR: क्या यही है लोकतंत्र का नया ढांचा?

पिछले कुछ समय से यह देखा जा रहा है कि चाहे सोशल मीडिया पर उठने वाली आवाजें हों या सड़कों और सार्वजनिक वाहनों में लगने वाले पोस्टर, सरकार का पहला रुख संवाद करने के बजाय दमनकारी कार्रवाई करने का होता है। बीजेपी सरकार के इस रवैये पर अब राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार ने जनता के हित में बेहतर काम किया है, तो उसे ऐसे पोस्टरों से डरने के बजाय अपने काम का ब्योरा जनता के सामने रखना चाहिए। बात-बात पर एफआईआर दर्ज करना और पुलिस का डर दिखाना सत्ता की ताकत नहीं, बल्कि उसकी अंदरूनी घबराहट और बौखलाहट को उजागर करता है।

साइबर क्राइम से तुलना और प्राथमिकताओं पर सवाल

इसी बीच दिल्ली पुलिस ने साइबर फ्रॉड के एक बड़े नेटवर्क को पकड़ने का दावा भी किया, जिसका संबंध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रिप्टो करेंसी और चीनी नागरिकों से बताया गया। एक तरफ जहां पुलिस असली अपराधियों को पकड़ने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ मेट्रो ट्रेन में सिर्फ दो कागज के पोस्टर लगाने वालों को पकड़ने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि प्रशासनिक प्राथमिकताओं को किस तरह राजनीतिक दबाव में तय किया जा रहा है। आज देश का आम नागरिक यह सवाल पूछने पर मजबूर है कि क्या आने वाले समय में सरकार से सवाल पूछने का अधिकार पूरी तरह छीन लिया जाएगा?

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.