यूनिकॉर्न' कंपनियों के पीछे शोषित मजदूर: वेतन और सुरक्षा को लेकर डिलीवरी पार्टनर्स की देशव्यापी हड़ताल-
यूनिकॉर्न' कंपनियों के पीछे शोषित मजदूर: वेतन और सुरक्षा को लेकर डिलीवरी पार्टनर्स की देशव्यापी हड़ताल-
नई दिल्ली | 2 जनवरी, 2026 स्विगी, ज़ोमैटो, ब्लिंकिट और ज़ेप्टो जैसी दिग्गज ऐप-आधारित कंपनियों के पहिये बुधवार को थम गए। इंडियन फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स (IFAT) के आह्वान पर देशभर के लाखों डिलीवरी एजेंट और गिग वर्कर्स अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं।
15 घंटे काम, फिर भी खाली हाथ
हड़ताल कर रहे श्रमिकों का मुख्य आरोप है कि कंपनियां लगातार अपना 'रेट कार्ड' (भुगतान ढांचा) बदल रही हैं, जिससे उनकी कमाई आधी रह गई है। एक प्रदर्शनकारी ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया, "हम दिन में 14-16 घंटे काम करते हैं, लेकिन हाथ में सिर्फ 700-800 रुपये आते हैं। इसमें पेट्रोल और गाड़ी का खर्च निकालने के बाद परिवार पालना मुश्किल है।" इसके अलावा, ऑर्डर कैंसिल होने पर जुर्माना और टीम लीडर्स द्वारा आईडी ब्लॉक करने की धमकियों ने असंतोष को और बढ़ा दिया है।
सुरक्षा और बीमा का अभाव
तेलंगाना गिग वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष शेख सलाउद्दीन ने आरोप लगाया कि दुर्घटना की स्थिति में कंपनियों से कोई बीमा सहायता नहीं मिलती। उन्होंने '10 मिनट डिलीवरी' मॉडल को तुरंत खत्म करने की मांग की है, क्योंकि यह राइडर्स की जान को जोखिम में डालता है। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि हड़ताल को दबाने के लिए कंपनियां बाउंसरों और आईडी ब्लॉकिंग का सहारा ले रही हैं।
राजनीतिक समर्थन और समाधान की मांग
आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि ये कंपनियां अरबों डॉलर की 'यूनिकॉर्न' तो बन गईं, लेकिन इनका आधार स्तंभ—गिग वर्कर—अत्यधिक दबाव और शोषण में है। उन्होंने 10 मिनट की डिलीवरी सेवा पर प्रतिबंध लगाने और श्रमिकों के काम के घंटे निर्धारित करने की वकालत की है।
वर्तमान में देशभर के 1.5 लाख से अधिक श्रमिक इस आंदोलन से जुड़ चुके हैं, जिससे ऑनलाइन डिलीवरी सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। अब गेंद केंद्र सरकार और इन कंपनियों के पाले में है कि वे इस 'आधुनिक गुलामी' को खत्म करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।


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