सनातन धर्म: प्राचीन परंपरा और विरोध का इतिहास
सनातन धर्म को लेकर देश की राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया है. तमिलनाडु विधानसभा में डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन के बयान ने इस प्राचीन धर्म और इसके विरोधियों के इतिहास को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. कुछ राजनीतिक हस्तियां इसे सामाजिक बुराइयों की जड़ मानकर समाप्त करने की बात कर रही हैं, जबकि समर्थक इसे सृष्टि के आदि और अंत से जोड़कर देखते हैं.
सनातन धर्म का अर्थ और प्राचीनता
‘सनातन’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है शाश्वत, यानी जो हमेशा से है और हमेशा रहेगा. इसे दुनिया का सबसे पुराना धर्म माना जाता है. सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेषों से इसके प्रमाण मिलते हैं. आधुनिक शोध के अनुसार यह कम से कम 12,000 वर्ष पुराना है, जबकि पौराणिक कथाओं और हिंदू ग्रंथों के अनुसार यह 90,000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है. यह केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है, जिसमें ब्रह्मांड के सभी ग्रह और नक्षत्र समाहित हैं.
चार युगों का कालक्रम
वैदिक शास्त्रों के अनुसार समय को चार युगों में बांटा गया है:
- सतयुग: 17,28,000 वर्ष
- त्रेतायुग: 12,96,000 वर्ष (भगवान राम का समय)
- द्वापरयुग: 8,64,000 वर्ष (भगवान कृष्ण का समय)
- कलियुग: 4,32,000 वर्ष (वर्तमान युग)
इन युगों के आधार पर चार धाम—बद्रीनाथ, रामेश्वरम, द्वारिकाधीश और जगन्नाथ पुरी—स्थापित हैं।
उदयनिधि स्टालिन के विवादित बयान
सितंबर 2023 में उदयनिधि ने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना जैसी बीमारियों से की और इसे जड़ से समाप्त करने की बात कही. मई 2026 में विधानसभा भाषण में उन्होंने इसे दोहराते हुए कहा कि यह धर्म जातिवाद फैलाता है, इसलिए सामाजिक समानता के लिए इसे खत्म करना जरूरी है.
विरोध करने वाली अन्य हस्तियां
डीएमके सांसद ए. राजा ने सनातन धर्म को एचआईवी और कुष्ठ रोग जैसी सामाजिक समस्याओं से जोड़ा. मंत्री के. पनमुरी ने दावा किया कि विपक्ष का गठबंधन मुख्य रूप से इसे समाप्त करने के लिए बनाया गया है.
इतिहास और पेरियार आंदोलन
सनातन धर्म के विरोध की पृष्ठभूमि पेरियार ई.वी. रामासामी के विचारों में मिलती है. 1925 में पेरियार ने आत्मसम्मान आंदोलन शुरू किया और जाति व्यवस्था व ब्राह्मणवाद के खिलाफ धर्म की आलोचना की. उन्होंने इसे दलित और पिछड़ों के शोषण का माध्यम बताया.
भौगोलिक और सांस्कृतिक आधार
सनातन धर्म केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है.वाल्मीकि रामायण में 64,000 तीर्थ बताए गए हैं. सप्तऋषि, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, उज्जैन और द्वारका इसकी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्थलों की पहचान हैं.
इतने प्राचीन और व्यापक आधार वाले धर्म को चुनौती देना केवल आस्था पर चोट नहीं, बल्कि भारत की हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक निरंतरता को भी प्रभावित करता है.

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