ईद-उल-अजहा 2026: 17 मई को दिखेगा चांद, 27 या 28 मई को मनाई जाएगी बकरीद

इस्लामी माहे जिलहिज्जा का चांद 17 मई 2026 की शाम को देखा जाएगा. अगर चांद दिखाई दिया तो ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का पर्व 27 मई, बुधवार को मनाया जाएगा. वहीं, यदि चांद नहीं दिखा तो यह पर्व 28 मई, गुरुवार को मनाया जाएगा. उलमा किराम 17 मई को चांद देखने की कोशिश करेंगे और नजदीकी जिलों से चांद की पुष्टि मिलने के बाद इसका ऐलान करेंगे. इस बार भी मुसलमान तीन दिनों तक कुर्बानी की रस्म निभाएंगे.

कुरआन में है कुर्बानी का हुक्म

शहर काजी मुफ्ती मुहम्मद अजहर शम्सी ने बताया कि दीन-ए-इस्लाम में कुर्बानी का बड़ा महत्व है. ईद-उल-अजहा का पर्व पैगंबर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके बेटे हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम की कुर्बानी की याद दिलाता है. मुफ्ती-ए-शहर अख्तर हुसैन मन्नानी के अनुसार, कुरआन-ए-पाक में फरमाया गया है: “ऐ महबूब, अपने रब के लिए नमाज पढ़ो और कुर्बानी करो.” कुर्बानी का मकसद केवल जानवर की जिब्ह नहीं, बल्कि इंसान अपने अंदर की बुराई और नकारात्मकता को भी अल्लाह की राह में समर्पित करता है.

मुसलमान ईद-उल-अजहा के दौरान लगातार तीन दिन तक कुर्बानी करते हैं. इस पर्व के जरिए इंसान अपने भीतर की बदअख्लाकी, लालच और नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्ति पाता है और अल्लाह की رضا हासिल करता है.

सूरह फातिहा इंसानों को देती है मार्गदर्शन

गोरखपुर की न्यू कॉलोनी तुर्कमानपुर और जाफरा बाजार की मस्जिदों में साप्ताहिक दर्स-ए-कुरआन के तहत हाफिज रहमत अली निजामी ने सूरह फातिहा की व्याख्या की. उन्होंने बताया कि सूरह फातिहा में सात आयतें हैं, जो अल्लाह की महानता, दया, मार्गदर्शन और सीधे रास्ते पर चलने की प्रार्थना सिखाती हैं.

कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी के अनुसार, सूरह फातिहा बंदे और अल्लाह के बीच सीधे जुड़ाव का माध्यम है. इसे पढ़ने से मानसिक शांति मिलती है, चिंताओं और बुरी नजर से बचाव होता है. पानी पर इसे पढ़कर फूंकने से बीमारियों में आराम मिलता है. इसे सूरह शिफा भी कहा जाता है.

दर्स के दौरान मुफ्ती मुहम्मद अजहर शम्सी, मुहम्मद इस्माईल, मुजफ्फर हसनैन रूमी, नेहाल अहमद, गजाली, अब्दुस्समद, रहमत अली, सफियान, शाद, जीशान, जावेद और अली अफसर समेत कई लोग शामिल हुए.

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