25 साल में PM Modi ने कब-कब लिया मंत्रियों से इस्तीफा? पूरी कहानी

भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो सरकार की साख, नीयत और उनके फैसले लेने की ताकत को सीधे चुनौती देते हैं। इस वक्त देश में सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है क्या NEET पेपर लीक विवाद के बीच विपक्ष के जोरदार हंगामे और प्रदर्शनों के आगे झुकते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ना पड़ेगा? या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने 25 सालों के बेदाग ट्रैक रिकॉर्ड को कायम रखते हुए इस बार भी 'इस्तीफा न देने की नीति' पर अड़े रहेंगे? विपक्ष और छात्र लगातार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अड़े हैं, लेकिन मोदी राज की क्रोनोलॉजी कुछ और ही कहानी बयां करती है। जी हां 13 साल गुजरात के मुख्यमंत्री और 12 साल से देश के प्रधानमंत्री के रूप में देश की कमान संभाल रहे नरेंद्र मोदी के पूरे राजनीतिक सफर का सबसे बड़ा कायदा यही रहा है कि प्रदर्शन ही पहला और आखिरी पैमाना है! आंदोलनों और विपक्ष के हल्ले-गुल्ले के दबाव में आकर मंत्रियों की बलि देना पीएम मोदी की डिक्शनरी में कभी रहा ही नहीं। आज की इस स्पेशल रिपोर्ट में हम खोलेंगे सत्ता के गलियारों का वो कच्चा-चिट्ठा, जो बताता है कि कब-कब मोदी राज में इस्तीफे हुए और कैसे मनमोहन सिंह के दौर में घोटालों और इस्तीफों की पूरी झड़ी लग गई थी!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति को करीब से समझने वाले जानते हैं कि वह बाहरी दबाव या मीडिया ट्रायल से नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक रिपोर्ट कार्ड और कानूनी मजबूरियों के आधार पर फैसले लेते हैं। हालांकि, अपने 25 साल के लंबे प्रशासनिक सफर में कुछ ऐसे मोड़ जरूर आए जब मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा। जैसे गुजरात के मुख्यमंत्री काल के वो 2 बड़े इस्तीफे। 

पहला मार्च 2009 में माया कोडनानी का इस्तीफा

2002 के नरोदा पाटिया दंगा मामले में जब गुजरात हाईकोर्ट ने तत्कालीन महिला एवं बाल कल्याण मंत्री माया कोडनानी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की, तो उन्हें तुरंत इस्तीफा देना पड़ा और उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। हालांकि सालों लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने उन्हें बरी कर दिया था।

दूसरा जुलाई 2010 में अमित शाह का इस्तीफा

सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में जब सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल की और गिरफ्तारी का संकट मंडराया, तब गुजरात के तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह ने पद से इस्तीफा दिया था। खुद तत्कालीन सीएम मोदी ने दिल्ली में उनके इस्तीफे का ऐलान किया था। कानूनी लड़ाई जीतने और क्लीन चिट मिलने के बाद अमित शाह सबसे पहले भगवान सोमनाथ के दर्शन करने पहुंचे थे।

आपको बता दें प्रधानमंत्री काल में मोदी सरकार ने कभी विपक्ष के जन-आंदोलनों के आगे घुटने टेककर इस्तीफा स्वीकार नहीं किया। लेकिन नीतिगत फैसलों, आंतरिक प्रदर्शन और चुनावी समीकरणों के तहत कई बड़े नाम जरूर हटाए गए। जैसे...

अक्टूबर 2018 में आरोपों के बाद विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर को पद छोड़ना पड़ा।

सितंबर 2020 में कृषि कानूनों के विरोध के बीच हरसिमरत कौर बादल ने कैबिनेट से इस्तीफा दिया।

जुलाई 2021 में कोरोना की दूसरी लहर के बाद कैबिनेट फेरबदल में डॉ. हर्षवर्धन समेत 12 मंत्रियों की छुट्टी हुई।

2021 में आईटी नियम विवाद के बीच रविशंकर प्रसाद को पद से हटाया गया।

2021 में स्वास्थ्य कारणों और नई शिक्षा नीति के बीच रमेश पोखरियाल निशंक की जगह नया मंत्री बनाया गया।

लेकिन दूसरी तरफ अगर मोदी सरकार के 12 सालों की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के 10 सालों के यूपीए शासनकाल से करें, तो दोनों के काम करने के तरीके में जमीन-आसमान का फर्क दिखता है। जी हां यूपीए-2 के दौरान भ्रष्टाचार, घोटालों और जांच एजेंसियों की गाज के चलते मनमोहन कैबिनेट ताश के पत्तों की तरह ढहती दिखती थी। घोटालों की आंधी और इस्तीफों की बरसात ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। जैसे...

2010 में 2G स्पेक्ट्रम मामले में आरोपों और राजनीतिक दबाव के बाद ए. राजा को दूरसंचार मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स विवाद में सुरेश कलमाड़ी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उनकी गिरफ्तारी हुई।

2013 में कोयला आवंटन मामले में सीबीआई रिपोर्ट विवाद के बाद अश्विनी कुमार को कानून मंत्री पद छोड़ना पड़ा।

2013 में रेलवे रिश्वत मामले में पवन कुमार बंसल को रेल मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

इसके अलावा 2010 में शशि थरूर पर आईपीएल विवाद

2011 में दयानिधि मारन पर 2G मामले में आरोप

2006 में शिबू सोरेन पर आपराधिक मामले में विवाद

2012 में FDI विवाद पर मुकुल रॉय समेत TMC के 6 मंत्रियों ने सरकार छोड़ी।

आपको बता दें यूपीए-2 के दौर में ही 2011 में अन्ना हजारे का ऐतिहासिक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा हुआ, जिसने जनता की मांग को लेकर संसद से सड़क तक भूचाल ला दिया और आखिरकार यही घोटाले 2014 में कांग्रेस के पतन का सबसे बड़ा कारण बने। वहीं अब लौटते हैं आज के सबसे गरमा-गरम मुद्दे पर कि क्या धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होगा? तो आपको बता दें संसद के भीतर और बाहर भले ही कांग्रेस और विपक्षी दल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे हों, लेकिन लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक जैसे आंदोलनकारी भी इस मुद्दे पर बहुत सोच-समझकर रुख अपना रहे हैं। धर्मेंद्र प्रधान कोई आम नेता नहीं हैं, बल्कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उन चुनिंदा 7 खास मंत्रियों में शामिल हैं, जो 2014 में सरकार बनने के पहले दिन से लेकर आज तक लगातार कैबिनेट का हिस्सा बने हुए हैं! 

दरअसल, धर्मेंद्र प्रधान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बेहद मजबूत पृष्ठभूमि से आते हैं और बीजेपी के सबसे भरोसेमंद संकटमोचकों में गिने जाते हैं। धर्मेंद्र प्रधान के जीवन का सबसे रोचक तथ्य यह है कि जब वे भाजयुमो के युवा छात्र नेता हुआ करते थे, तब वे पहली बार राष्ट्रीय सुर्खियों में ही तब आए थे जब उन्होंने ओडिशा के भुवनेश्वर में पेपर लीक के खिलाफ एक बहुत बड़े छात्र आंदोलन की अगुवाई की थी! वहीं धर्मेंद्र प्रधान ने 2021 के जुलाई महीने में ही देश के शिक्षा मंत्री के रूप में शपथ ली थी और आज उसी जुलाई के महीने में उनके इस्तीफे को लेकर पूरे देश में सियासी बवाल मचा हुआ है। वहीं सरकार के अंदरूनी सूत्रों और शीर्ष नेतृत्व के रुख से यह साफ जाहिर होता है कि पीएम मोदी अपने किसी भी मंत्री का इस्तीफा विपक्ष के दबाव में आकर तो बिल्कुल नहीं देने वाले। सरकार का साफ मानना है कि जब उन्होंने खुद पेपर लीक के खिलाफ फास्ट ट्रैक कोर्ट्स बनाने और सख्त कानून लागू करने का ऐतिहासिक फैसला ले लिया है, तो किसी मंत्री के बलि देने का सवाल ही पैदा नहीं होता।

देखा जाए तो इतिहास इस बात का गवाह है कि मनमोहन सिंह का दौर दबाव और इस्तीफों का दौर था, जहां विपक्ष का जरा सा हमला मंत्री की कुर्सी छीन लेता था। लेकिन नरेंद्र मोदी का दौर कड़े फैसलों और सख्त सिस्टम का दौर है, जहां राजनीति का फैसला सड़कों के शोर से नहीं बल्कि प्रशासनिक कसौटी पर होता है। धर्मेंद्र प्रधान के मामले में सरकार ने साफ संकेत दे दिया है कि वे बैकफुट पर खेलने के बजाय सीधे फ्रंटफुट पर आकर फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसे स्ट्राइक से पेपर माफियाओं को मिटाएंगे। अब देखना यह है कि विपक्ष का यह सियासी चक्रव्यूह मोदी के इस अभेद्य किले को भेद पाता है या फिर हर बार की तरह इस बार भी पीएम मोदी अपने फैसले पर अडिग रहकर बाजी मार ले जाते हैं!

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