हेमा और धरम: अमर मुहब्बत की दास्तान
एक ओर सिनेमा के परदे पर प्रेमी अपनी प्रेयसी के लिए गुनगुना रहा था—“पहली नज़र में हमने तो अपना दिल दे दिया था तुमको…”और दूसरी ओर जिंदगी के पर्दे पर एक ऐसी मुहब्बत पल रही थी, जिसे दुनिया समझ नहीं पाई, मगर वक्त ने उसे अमर कर दिया।प्रेमिका की आवाज़ में भी वही दीवानगी थी—“तुम्हें दिल में बंद कर लूं, दरिया में फेंक दूं चाबी…”यही दो पंक्तियाँ, मानो उनकी पूरी जीवनी का निचोड़ हों।

यह वही समय था जब न इंस्टाग्राम था, न रील्स। बस ट्रांजिस्टर के सहारे विविध भारती की रातें और सिनेमा का जादू। और इसी जादू के बीच जन्मी वह प्रेमकथा , जो जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही मुश्किलों से भरी। उनके बीच दुनिया की ऊंची दीवारें थीं..जी हां हम बात कर रहे हैं हेमा मालिनी और धर्मेंद्र की .. धर्मेंद्र शादीशुदा थे, चार बच्चों के पिता थे। इंडस्ट्री भी इस रिश्ते के खिलाफ थी। पर मुहब्बत किसी दीवार की मोहताज नहीं होती। वह तो नदी की तरह बहती है, और अगर रोकने की कोशिश करो, तो रास्ता बदल लेती है—पर रुकती नहीं। हेमा ने एक बार दिल दे दिया तो फिर चाबी सचमुच दरिया में बहा दी। धर्मेंद्र भी उस दिल के कैदी बन गए, जिन्हें वह कभी आज़ाद नहीं करना चाहती थीं।

आज धर्मेंद्र नहीं रहे। अपने 90वें जन्मदिन से बस कुछ दिन पहले ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। पर हेमा के दिल में यादों का कौन-सा तूफान घूम रहा होगा—ये वही जान सकती हैं। पर दुनिया जानती है कि यह प्रेम आज भी उतना ही जीवंत है जितना तब था जब यह शुरू हुआ था। इस प्रेम की शुरुआत 1965 में हुई, जब हेमा ने पहली बार धर्मेंद्र को फिल्म ‘आसमान महल’ के प्रीमियर पर देखा और मन ही मन कहा—“इतना हैंडसम आदमी पहले कभी नहीं देखा।” वह ख्याल आया और चला गया, क्योंकि यह रास्ता आसान नहीं था। 1968 में ‘तुम हसीन मैं जवान’ के सेट पर दोनों पहली बार आमने-सामने आए। हेमा सिर्फ 20 की थीं, धर्मेंद्र 33 के। वह करियर की शुरुआत कर रही थीं, धरम अपने शिखर पर थे। फिल्म रिलीज होने तक कहानी सिल्वर स्क्रीन से निकलकर दिलों में उतर चुकी थी। उन्हें पता था कि इस रिश्ते का भविष्य धुंधला है, पर प्यार तो मुनादी नहीं करता—बस हो जाता है।

इस बीच ड्रीमगर्ल के दो दीवाने भी सामने आए। संजीव कुमार ने चोरी-चोरी प्यार किया, पैगाम भी भिजवाया, पर हेमा ने इंकार कर दिया। संजीव का दिल ऐसा टूटा कि उन्होंने कभी शादी नहीं की। उधर जीतेंद्र भी हेमा के करीब आए और रिश्ता लगभग तय हो गया। परिवार बैठ गए थे। लेकिन जैसे ही यह खबर धर्मेंद्र तक पहुंची, रातभर मुंबई से बजती फोन की घंटियों ने किस्मत की दिशा बदल दी। उस रात ने साबित कर दिया कि दिल के फैसले कागज़ पर नहीं होते।

फिर आया ‘शोले’ का दौर—जहाँ असल में उनका प्यार परवान चढ़ा। धर्मेंद्र ठाकुर की भूमिका चाहते थे, पर जब पता चला कि वीरू बनकर ही उन्हें हेमा के साथ रोमांस मिलेगा, तो वीरू ही बन गए। कभी-कभी किरदार नहीं, दिल फैसले करवाता है। शूटिंग के दौरान संजीव कुमार ने एक बार फिर हेमा को प्रपोज किया,जिससे धरम परेशान हो उठे और सेट पर डेकोरम की गुहार लगाई। नतीजा—पूरी फिल्म में ठाकुर और बसंती का एक भी सीन साथ नहीं।

1980 में दोनों ने शादी का फैसला किया। धर्मेंद्र की पत्नी प्रकाश कौर तलाक देने को तैयार नहीं थीं। इसलिए उन्होंने इस्लाम कबूल किया और फिर निकाह किया। बाद में हेमा की संस्कृति और परिवार की भावनाओं का सम्मान करते हुए अय्यंगर रीति से भी विवाह किया। यह रिश्ता आसान नहीं था, पर जितना मुश्किल था, उतना ही सच्चा भी।

धरम के माता-पिता ने हेमा को अपनाया। उनके पिता केवल कृष्ण सिंह देओल हेमा के पिता और भाई से मिलते और हंसते-खेलते वक्त बिताते। उनकी मां सतवंत कौर ने पहली ही मुलाकात में आशीर्वाद दिया—“बेटा, हमेशा खुश रहो।” जब ईशा पैदा होने वाली थीं, धरम ने पूरा नर्सिंग होम बुक कर लिया—सौ कमरे। यह प्यार का उत्सव था, जिसे वह दुनिया के सामने भले न दिखाते हों, पर महसूस कराने में कभी कंजूसी नहीं करते थे।

हेमा ने हमेशा प्रकाश कौर का सम्मान किया। कभी उनके बारे में बुरा नहीं कहा। वहीं प्रकाश ने भी एक पत्नी के दर्द और एक औरत की समझ के साथ स्वीकारा—“अगर मैं हेमा की जगह होती तो शायद ऐसा नहीं करती, पर मैं उनकी भावनाएँ समझ सकती हूँ।” यह एक ऐसी प्रेमकथा थी जिसमें कोई खलनायक नहीं था—बस हालात थे, मजबूरियाँ थीं और तीन दिलों का दर्द था।

आज धर्मेंद्र इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी मुस्कान, उनकी आवाज़, उनका ख्याल और सबसे बढ़कर—उनकी और हेमा की मुहब्बत—हमेशा ज़िंदा रहेगी। यह कहानी सिर्फ सिनेमा की नहीं, इंसानी दिल की है। वह सिखाती है कि प्यार चाहे जितनी परीक्षाओं से गुज़रे, अगर सच्चा हो तो वक़्त के साथ फीका नहीं पड़ता—बल्कि और गहरा होता जाता है। यह कहानी खत्म नहीं हुई—यह तो अब अमर हुई है।
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