सावधान! दुबले-पतले और नॉर्मल वजन वाले युवा भी हो रहे डायबिटीज के शिकार
कोलकाता के गरियाहाट निवासी शांतनु बोस वर्षों तक इस गलतफहमी में जीते रहे कि उनका दुबला-पतला शरीर उन्हें मधुमेह से बचाए रखेगा। इसी तरह हावड़ा के शंकर सिंह भी यही सोचते रहे, लेकिन जब अचानक तबीयत बिगड़ी और जांच कराई गई तो दोनों को टाइप-2 डायबिटीज होने का पता चला।

यह सोच आम है कि डायबिटीज केवल मोटापे से जुड़ी बीमारी है, लेकिन हाल के शोध और चिकित्सा अनुभव इस धारणा को गलत साबित कर रहे हैं। भारत सहित दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में ऐसे मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जिनका वजन सामान्य या उससे कम है, फिर भी वे मधुमेह से प्रभावित हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति ‘लीन डायबिटीज’ के रूप में जानी जाती है, जो टाइप-2 डायबिटीज का ही एक अलग रूप है। इसमें शरीर बाहर से दुबला दिखाई देता है, लेकिन अंदरूनी रूप से खासकर पेट और लिवर के आसपास फैट जमा हो सकता है। इसे मेडिकल भाषा में ‘थिन-फैट फेनोटाइप’ कहा जाता है, जो इंसुलिन प्रतिरोध को बढ़ाकर ब्लड शुगर नियंत्रण को बिगाड़ देता है।

कोलकाता स्थित एनआरएस मेडिकल कॉलेज के मधुमेह विशेषज्ञ बताते हैं कि इस स्थिति में शरीर का वजन भले ही सामान्य दिखे, लेकिन आंतरिक चयापचय संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे इंसुलिन का प्रभाव कम हो जाता है और धीरे-धीरे मधुमेह विकसित होने लगता है।

वहीं, डायबिटीज अवेयरनेस एंड यू (DAE) के संस्थापक सचिव इंद्रजीत मजूमदार के अनुसार इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। बचपन में सही पोषण की कमी से अग्न्याशय का विकास प्रभावित होता है, जिससे आगे चलकर इंसुलिन उत्पादन क्षमता कमजोर पड़ सकती है। इसके अलावा कम मांसपेशियों वाला शरीर भी एक बड़ा कारण है, क्योंकि मांसपेशियां ग्लूकोज को ऊर्जा में बदलने में अहम भूमिका निभाती हैं।

आनुवंशिक कारक भी इस बीमारी के जोखिम को बढ़ाते हैं। जिन लोगों का जन्म कम वजन के साथ हुआ हो, उनमें आगे चलकर लीन डायबिटीज का खतरा अधिक देखा गया है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि दुबले लोगों में इसका अंदेशा कम माना जाता है, जिसके कारण जांच और पहचान देर से होती है।विशेषज्ञों का सुझाव है कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और समय-समय पर ब्लड शुगर की जांच इस बीमारी से बचाव में बेहद जरूरी हैं।
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