ट्रंप का 'महा यू-टर्न': कल तक विनाश की धमकी, आज ईरान से दोस्ती!

कल तक जो डोनाल्ड ट्रंप ईरान को मिटा देने की धमकी दे रहे थे, आज वही ट्रंप ईरान के लिए मदद का हाथ बढ़ा रहे हैं। जी हां, विनाश के मुहाने पर खड़ी दुनिया ने राहत की सांस ली है क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के सीजफायर पर मुहर लग गई है। लेकिन रुकिए! जहां पश्चिम में शांति की सुगबुगाहट है, वहीं पूर्व में किम जोंग उन ने जापान की नींद उड़ा दी है। जी हां उत्तर कोरिया ने एक और खतरनाक मिसाइल दागी है! क्या दुनिया एक युद्ध से निकलकर दूसरे की ओर बढ़ रही है? आइए जानते हैं इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की पूरी कहानी...

आपको बता दें कल तक व्हाइट हाउस से ईरान को राख कर देने की धमकियां गूंज रही थीं...कल तक डोनाल्ड ट्रंप कह रहे थे कि ईरान को ऐसा सबक सिखाएंगे कि उसकी सभ्यता मिट जाएगी! लेकिन अचानक...महज 24 घंटे के भीतर पूरी बिसात पलट गई है। जंग के मैदान से तोपें पीछे हट रही हैं और इस्लामाबाद की मेज पर शांति के दस्तावेज बिछाए जा रहे हैं। जी हां! अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक दो हफ्तों के सीजफायर का ऐलान हो चुका है। दुनिया की सबसे बड़ी लाइफलाइन कही जाने वाली स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ईरान पूरी तरह खोलने पर राजी हो गया है। लेकिन ये शांति इतनी भी सीधी नहीं है! इसके पीछे पाकिस्तान की मध्यस्थता है, चीन की बैकडोर डिप्लोमेसी का मास्टरमाइंड गेम है और ट्रंप का वो चौंकाने वाला महा यू-टर्न है जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों के होश उड़ा दिए हैं। लेकिन ठहरिए! एक तरफ जहां खाड़ी देशों में बारूद की गंध कम हुई है, वहीं दूसरी तरफ पूरब से एक और खौफनाक खबर आई है। आज ही के दिन, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने जापान की ओर एक बैलिस्टिक मिसाइल दागकर पूरी दुनिया को फिर से दहला दिया है। जापान में इमरजेंसी अलर्ट जारी है, सायरन बज रहे हैं और समंदर में लहरें नहीं, उत्तर कोरिया का न्यूक्लियर खौफ तैर रहा है।

जहां अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिनों के सीजफायर पर सहमति बन गई है। इसकी सबसे बड़ी शर्त यह है कि ईरान 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' को तुरंत और पूरी तरह से व्यापारिक जहाजों के लिए खोल देगा। वहीं इस पूरी डील के पीछे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का बड़ा हाथ बताया जा रहा है। ट्रंप ने खुद सोशल मीडिया पर लिखा कि उनके अनुरोध पर उन्होंने सैन्य अभियान रोकने का फैसला किया है। वहीं ईरान ने जो शांति प्रस्ताव दिया है, उसने विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। ईरान चाहता है कि अमेरिका उस पर कभी हमला न करने की गारंटी दे, परमाणु संवर्धन जारी रहे, और युद्ध के नुकसान का हर्जाना भी अमेरिका ही भरे। जहां ट्रंप ने इसे काम करने लायक आधार मान लिया है, जिसे कई लोग ट्रंप का झुकना कह रहे हैं।

आपको बता दें जैसे ही सीजफायर और होर्मुज स्ट्रेट खुलने की खबर आई, पूरी दुनिया के बाजारों में हरियाली छा गई। कच्चे तेल की कीमतों में 13% की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। ब्रेंट क्रूड अब 95 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया है।
वहीं अगर यह शांति बरकरार रहती है, तो आने वाले दिनों में आपके पेट्रोल-डीजल के दाम भी कम हो सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ ट्रंप ने एक और बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने दावा किया कि इस पूरी डील के पीछे चीन का हाथ है। चीन ने सामने आने के बजाय पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के जरिए बैकडोर डिप्लोमेसी की। हालांकि, चीन ने आधिकारिक तौर पर इसे स्वीकार नहीं किया है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में उसने रूस के साथ मिलकर अमेरिका के प्रस्ताव को रोक दिया था। कहा जा रहा है कि चीन खुद को एक ग्लोबल पावर के रूप में स्थापित कर रहा है जो अमेरिका और ईरान जैसे कट्टर दुश्मनों को भी एक टेबल पर ला सकता है।

 हालांकि भले ही अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर हो गया हो, लेकिन इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि यह समझौता हिजबुल्लाह पर लागू नहीं होता। इजरायल दक्षिण लेबनान में अपना सैन्य अभियान जारी रखेगा। यानी ईरान की एक बड़ी शर्त फिलहाल अधूरी ही रह गई है। एक तरफ खाड़ी देशों में शांति की कोशिशें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ आज यानी 8 अप्रैल को उत्तर कोरिया ने जापान की ओर बैलिस्टिक मिसाइल दागकर सनसनी फैला दी है। जापान के प्रधानमंत्री कार्यालय ने तुरंत अलर्ट जारी किया। क्राइसिस मैनेजमेंट टीम एक्टिव हो गई है और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर रहने की सलाह दी गई है। आपको बता दें यह मिसाइल ऐसे समय में दागी गई है जब अमेरिका ईरान के साथ व्यस्त है। किम जोंग उन शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि उन्हें नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति की यह बिसात बेहद पेचीदा हो गई है। एक तरफ ट्रंप का यू-टर्न दुनिया को गोल्डन एज ऑफ मिडिल ईस्ट की तरफ ले जाने का दावा कर रहा है, तो दूसरी तरफ उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण फिर से खतरे की घंटी बजा रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या 10 अप्रैल को इस्लामाबाद में होने वाली बैठक स्थायी शांति लाएगी? या फिर यह सिर्फ एक तूफान से पहले की खामोशी है? 

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