ट्रंप-मोदी की 40 मिनट की 'मैराथन कॉल': क्या भारत बनेगा ईरान-अमेरिका संकट का संकटमोचक?

जब दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतें 40 मिनट तक फोन पर हों, तो समझ लीजिए कि ग्लोबल पॉलिटिक्स का नक्शा बदलने वाला है। जी हां दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन लगाया और यह बातचीत कोई औपचारिक शिष्टाचार भर नहीं थी। बल्कि पूरे 40 मिनट तक चली इस मैराथन कॉल ने वैश्विक राजनीति के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। एक तरफ पश्चिम एशिया सुलग रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ शांति वार्ताएं पटरी से उतर चुकी हैं। ऐसे में ट्रंप का मोदी को याद करना और यह कहना कि "हम सब आपसे प्यार करते हैं", बड़े कूटनीतिक बदलावों का संकेत है। वहीं सवाल ये भी उठ रहे हैं कि क्या भारत अब ईरान और अमेरिका के बीच मचे इस महायुद्ध को शांत कराएगा? आइए, इस पूरी इनसाइड स्टोरी को विस्तार से समझते हैं।

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पीएम मोदी के बीच हुई इस बातचीत का केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज रहा। यह वो समुद्री रास्ता है जहां से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल और गैस के लिए गुजरता है। ईरान ने इस पर नियंत्रण की जिद पकड़ रखी है, तो वहीं ट्रंप ने इसे खुला रखने के लिए अपनी नौसेना का पहरा लगा दिया है। आपको बता दें इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता नाकाम होने के बाद ट्रंप ने बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी नौसेना ने अरब सागर के मुहाने पर ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी कर दी है। ट्रंप का सीधा संदेश है कि "अगर हमारा जहाज नहीं निकलेगा, तो तुम्हारा भी कोई जहाज बाहर नहीं जाएगा।" ट्रंप इस नाकेबंदी के जरिए ईरान की आर्थिक कमर तोड़ना चाहते हैं, लेकिन इस खेल में वो दुनिया भर में अकेले पड़ते नजर आ रहे हैं। वहीं इस विवाद में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप के पुराने साथी यानी NATO और यूरोपीय देशों ने इस सैन्य दखल से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है। अमेरिका के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी सैन्य अभियान में उसे अपनों का ही साथ नहीं मिल रहा। वहीं दूसरी ओर, चीन इस नाकेबंदी से बुरी तरह तिलमिला गया है। क्योंकि ईरान से सबसे ज्यादा तेल और गैस चीन ही खरीदता है। ऐसे में अगर होर्मुज का रास्ता बंद होता है, तो चीन की फैक्ट्रियां ठप हो सकती हैं। इसलिए चीन ने ट्रंप के इस कदम को गैर-जिम्मेदाराना और खतरनाक करार दिया है। चीन के विदेश मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि यह कदम नाजुक युद्धविराम को पूरी तरह तबाह कर देगा।

कहा जा रहा है कि ट्रंप इस वक्त काफी दबाव में हैं। युद्ध लंबा खिंच रहा है, दोस्त साथ छोड़ रहे हैं और चीन दुश्मन बना बैठा है। ऐसे में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जिसकी साख दोनों तरफ मजबूत है। दरअसल, भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक और व्यापारिक संबंध हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर लगातार ईरानी नेतृत्व के संपर्क में हैं। ऐसे में ट्रंप जानते हैं कि अगर भारत कोई बात कहेगा, तो ईरान उसे हल्के में नहीं लेगा। वहीं अमेरिका भारत को अपना सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक साझेदार मानता है, इसीलिए ट्रंप ने बातचीत के अंत में दिल खोलकर मोदी के प्रति अपना लगाव जाहिर किया। इतना ही नहीं इस फोन कॉल के तुरंत बाद भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने एक और बड़ा धमाका किया है। उन्होंने संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा सहित कई क्षेत्रों में बड़े सौदों की घोषणा होने वाली है। हालांकि उन्होंने विस्तार से कुछ नहीं बताया, लेकिन उनके शब्दों में छिपा उत्साह बता रहा है कि भारत इस संकट के बीच कुछ बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत हासिल करने वाला है। यह इस साल दोनों नेताओं के बीच तीसरी बातचीत थी, जो साफ दिखाती है कि वैश्विक संकटों के समाधान के लिए अब वाशिंगटन की नजरें हमेशा नई दिल्ली की ओर टिकी रहती हैं।

ऐसे में अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या दुनिया एक बार फिर भारत की सॉफ्ट पावर का लोहा मानेगी? 40 मिनट की इस बातचीत ने यह तो साफ कर दिया है कि पश्चिम एशिया के संकट का समाधान अब केवल बंदूकों से नहीं, बल्कि उस कूटनीतिक मेज पर निकलेगा जहां भारत मौजूद है। ट्रंप की नाकेबंदी, चीन की बौखलाहट और यूरोप की चुप्पी के बीच पीएम मोदी का संतुलित रुख ही इस विश्व युद्ध जैसी स्थिति को टाल सकता है। अब सबकी नजरें उन बड़े सौदों पर टिकी हैं जिनका जिक्र अमेरिकी राजदूत ने किया है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का कद अब उस ऊंचाई पर है जहां महाशक्तियां भी हाथ जोड़कर सहयोग मांग रही हैं। कूटनीति के इस शतरंज में अगली चाल किसकी होगी, यह देखना बेहद रोमांचक होगा! 

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