कोलकाता में कैसे शुरू हुई दुर्गा पूजा पंडाल की परंपरा? जानिए जमींदारों की हवेली से थीम पंडाल तक की दिलचस्प कहानी
AKANSHA UPADHYAY
आज दुर्गा पूजा का नाम आते ही आंखों के सामने भव्य पंडाल, आकर्षक लाइटिंग, अनोखी थीम और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ का नजारा उभर आता है। खासकर कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान पंडाल घूमना त्योहार का एक अहम हिस्सा बन चुका है। हर साल लोग परिवार और दोस्तों के साथ मां दुर्गा के दर्शन करने और खूबसूरत पंडालों को देखने के लिए निकलते हैं। कहीं ऐतिहासिक इमारतों की झलक दिखाई देती है, तो कहीं सामाजिक मुद्दों और आधुनिक कला पर आधारित थीम लोगों का ध्यान खींचती हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुर्गा पूजा हमेशा से इतनी भव्य और सार्वजनिक नहीं थी? एक समय था, जब यह आयोजन मुख्य रूप से जमींदारों और संपन्न परिवारों की हवेलियों तक सीमित रहता था। फिर धीरे-धीरे यह परंपरा निजी आंगनों से निकलकर पूरे समाज के उत्सव में बदल गई। आइए जानते हैं कि कोलकाता में दुर्गा पूजा पंडालों की परंपरा कैसे शुरू हुई और पंडाल घूमना इस त्योहार की पहचान कैसे बन गया।
जमींदारों की हवेली से जुड़ा है दुर्गा पूजा का इतिहास
आज भले ही दुर्गा पूजा के लिए विशाल पंडाल बनाए जाते हों, लेकिन इसकी शुरुआती परंपरा का संबंध बंगाल के संपन्न परिवारों और जमींदारों से रहा है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, ताहेरपुर के राजा कांगसानारायण का नाम बंगाल में भव्य दुर्गा पूजा आयोजित करने वाले शुरुआती शासकों में लिया जाता है। माना जाता है कि 16वीं शताब्दी के अंत या 17वीं शताब्दी की शुरुआत में उन्होंने बड़े स्तर पर दुर्गा पूजा का आयोजन कराया था।
उस समय पूजा किसी सार्वजनिक मैदान या सड़क पर नहीं, बल्कि महलों और हवेलियों के आंगन में आयोजित की जाती थी। इन आयोजनों में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ भव्य सजावट, भोज और सांस्कृतिक गतिविधियां भी शामिल होती थीं। पूजा का आयोजन परिवार की प्रतिष्ठा और सामाजिक हैसियत दिखाने का माध्यम भी बन गया था। हालांकि, राजा कांगसानारायण के आयोजन को आज के कोलकाता में आधुनिक पंडाल परंपरा की शुरुआत मानना सही नहीं होगा। यह बंगाल में भव्य पारिवारिक दुर्गा पूजा की पुरानी परंपरा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग है।
जब दुर्गा पूजा सिर्फ अमीर परिवारों तक सीमित थी
17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान बंगाल के कई समृद्ध और कुलीन परिवारों ने दुर्गा पूजा को अपनी पारिवारिक परंपरा का हिस्सा बनाया। कोलकाता के पाथुरियाघाट और जोरासांको जैसे इलाकों के प्रतिष्ठित परिवारों की दुर्गा पूजा अपने वैभव और धार्मिक आयोजनों के लिए जानी जाती थी।इन पूजाओं में आमतौर पर परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और चुनिंदा मेहमानों को ही शामिल होने का अवसर मिलता था। आम लोगों की भागीदारी सीमित रहती थी। इस तरह दुर्गा पूजा धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक भी बन गई।लेकिन समय के साथ समाज में बदलाव आने लगे। शहरों का विस्तार हुआ, लोगों के बीच सामूहिक आयोजनों की भावना बढ़ी और दुर्गा पूजा को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने की कोशिशें शुरू हुईं। यही बदलाव आगे चलकर सार्वजनिक दुर्गा पूजा की नींव बने।
12 दोस्तों के प्रयास से शुरू हुई सार्वजनिक दुर्गा पूजा की परंपरा
दुर्गा पूजा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ सार्वजनिक पूजा यानी सार्बोजनिन दुर्गा पूजा की शुरुआत को माना जाता है। प्रचलित ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1790 में हुगली जिले के गुप्तिपारा में 12 ब्राह्मण मित्रों ने मिलकर सामूहिक रूप से दुर्गा पूजा आयोजित की थी।उस दौर में किसी एक व्यक्ति के लिए भव्य पूजा का पूरा खर्च उठाना आसान नहीं था। इसलिए इन लोगों ने आपस में चंदा इकट्ठा किया और सामूहिक प्रयास से पूजा का आयोजन किया। इसी परंपरा को बारोवारी पूजा के नाम से जाना गया। 'बारोवारी' शब्द को आमतौर पर 'बारो' यानी बारह और 'यारी' यानी मित्रता से जोड़कर समझाया जाता है।
इस आयोजन की खासियत यह थी कि पूजा किसी एक परिवार की निजी संपत्ति या प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं रही, बल्कि सामूहिक भागीदारी का माध्यम बनी। हालांकि, बारोवारी पूजा और आज की व्यापक जनभागीदारी वाली सार्बोजनिन पूजा के विकास के बीच ऐतिहासिक अंतर को समझना जरूरी है। सार्वजनिक पूजा की परंपरा कई चरणों में विकसित हुई।धीरे-धीरे बंगाल के अलग-अलग इलाकों में लोगों ने चंदा जुटाकर पूजा समितियां बनानी शुरू कीं। इससे दुर्गा पूजा में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ी और यह आयोजन समुदाय की एकजुटता का प्रतीक बनने लगा।
स्वतंत्रता आंदोलन ने भी बदला दुर्गा पूजा का स्वरूप
समय के साथ दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना से भी जुड़ गई। ब्रिटिश शासन के दौरान देवी दुर्गा की शक्ति और महिषासुर पर उनकी विजय को अन्याय के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक के रूप में भी देखा जाने लगा।बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के 'वंदे मातरम्' जैसे राष्ट्रवादी साहित्य और उस दौर की सांस्कृतिक चेतना ने मातृभूमि को देवी के रूप में देखने की भावना को मजबूती दी। हालांकि, दुर्गा पूजा और स्वतंत्रता आंदोलन का संबंध अलग-अलग समय और संदर्भों में विकसित हुआ था।20वीं शताब्दी में सार्वजनिक पूजा समितियों की संख्या बढ़ने के साथ दुर्गा पूजा सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का बड़ा मंच बन गई। पंडालों में सजावट, संगीत, नाटक और विभिन्न सामुदायिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे। इस तरह मां दुर्गा की आराधना के साथ बंगाली पहचान, कला और सामूहिक उत्सव की भावना भी जुड़ती चली गई।
विभाजन के बाद कोलकाता में क्यों बढ़ा दुर्गा पूजा का महत्व?
1947 में भारत के विभाजन और उसके बाद पूर्वी पाकिस्तान, जो आगे चलकर बांग्लादेश बना, से पश्चिम बंगाल आए लोगों के प्रवास ने कोलकाता के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। बड़ी संख्या में शरणार्थी अपने साथ खानपान, संगीत, धार्मिक परंपराएं और सामुदायिक जीवन की स्मृतियां लेकर आए।नए इलाकों में बसने वाले लोगों के लिए दुर्गा पूजा सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं थी, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने और नए समाज से जुड़ने का अवसर भी थी। स्थानीय लोगों के सहयोग से कई जगह सामुदायिक आयोजनों को बढ़ावा मिला। इससे सार्वजनिक दुर्गा पूजा को सामाजिक जीवन में और अधिक महत्व मिला।हालांकि, कोलकाता में सार्वजनिक दुर्गा पूजा का विकास विभाजन के बाद ही शुरू नहीं हुआ था। इसकी जड़ें इससे पहले की सामूहिक पूजा परंपराओं में मौजूद थीं। विभाजन और शरणार्थियों के आगमन ने इस परंपरा को नए सामाजिक संदर्भ और विस्तार देने में भूमिका निभाई।
कब पंडाल घूमना बन गया दुर्गा पूजा का सबसे बड़ा आकर्षण?
जैसे-जैसे सार्वजनिक दुर्गा पूजा लोकप्रिय हुई, वैसे-वैसे पंडालों की सजावट और उनके निर्माण में भी बदलाव आने लगा। शुरुआत में पूजा के लिए साधारण ढांचे बनाए जाते थे, लेकिन समय के साथ बांस, कपड़े, मिट्टी और अन्य सामग्रियों से आकर्षक पंडाल तैयार किए जाने लगे।आगे चलकर कलाकारों, कारीगरों और डिजाइनरों ने पंडालों को अपनी रचनात्मकता दिखाने का माध्यम बना लिया। कहीं मंदिरों और ऐतिहासिक इमारतों की प्रतिकृतियां बनाई जाने लगीं, तो कहीं लोककला, ग्रामीण जीवन, पर्यावरण और समसामयिक विषयों को सजावट का आधार बनाया गया।
बड़ी संख्या में पंडालों के निर्माण और उनके बीच रचनात्मक प्रतिस्पर्धा ने लोगों को एक से दूसरे पंडाल तक जाने के लिए आकर्षित किया। धीरे-धीरे पंडाल घूमना दुर्गा पूजा के उत्सव का अहम हिस्सा बन गया। आज इसे आम बोलचाल में 'पंडाल हॉपिंग' भी कहा जाता है।कोलकाता में पूजा समितियां हर साल नई थीम, अनोखी मूर्तियों और आकर्षक रोशनी के जरिए लोगों को लुभाने की कोशिश करती हैं। यही वजह है कि दुर्गा पूजा के दिनों में पूरा शहर एक विशाल सांस्कृतिक प्रदर्शनी जैसा नजर आने लगता है।
निजी पूजा से जन-उत्सव तक का सफर
कोलकाता की दुर्गा पूजा की कहानी सिर्फ भव्य पंडालों और खूबसूरत सजावट की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी भी है, जिसमें एक समय संपन्न परिवारों तक सीमित रहने वाला धार्मिक आयोजन धीरे-धीरे आम लोगों का साझा उत्सव बन गया।जमींदारों की हवेलियों से शुरू हुई भव्य पारिवारिक पूजा, सामूहिक चंदे से आयोजित बारोवारी पूजा और फिर सार्वजनिक पूजा समितियों की परंपरा ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई। समय के साथ कला, संस्कृति, सामाजिक भागीदारी और आधुनिक तकनीक ने इसे एक नया रूप दिया।
आज कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान पंडाल घूमना केवल मां दुर्गा के दर्शन करने का तरीका नहीं, बल्कि शहर की कला, संस्कृति और सामूहिक उत्साह को करीब से महसूस करने का अवसर भी है। यही वजह है कि हर साल लाखों लोग इस उत्सव का हिस्सा बनने के लिए निकलते हैं और दुर्गा पूजा को एक धार्मिक पर्व के साथ-साथ एक जीवंत सांस्कृतिक अनुभव भी बनाते हैं।

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