दुर्गा पूजा में क्यों किया जाता है धुनुची नृत्य? जानिए इसकी शुरुआत, परंपरा और आध्यात्मिक महत्व
AKANSHA UPADHYAY
गूंजती ढाक की थाप, सुलगते नारियल के रेशों से उठता धुआं और धूप-कपूर की मनमोहक खुशबू। हाथों में धुनुची थामे जब भक्त मां दुर्गा की आराधना में झूमते हैं, तो पूरा पंडाल भक्ति, उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता है। पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा में धुनुची नृत्य का नजारा इतना आकर्षक होता है कि हर किसी की निगाहें इस पर टिक जाती हैं।हालांकि, धुनुची नृत्य महज एक पारंपरिक नृत्य या उत्सव का हिस्सा नहीं है, बल्कि इसे मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा, प्रेम और समर्पण व्यक्त करने का एक खास माध्यम माना जाता है। महासप्तमी से लेकर महानवमी तक, खासकर संध्या आरती के दौरान, ढाक की लय पर किया जाने वाला यह नृत्य दुर्गा पूजा के उत्सव में चार चांद लगा देता है। ऐसे में आइए जानते हैं धुनुची नृत्य की शुरुआत कैसे हुई, इसे क्यों किया जाता है और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं।
क्या है धुनुची नृत्य और क्यों किया जाता है?
धुनुची नृत्य बंगाल की दुर्गा पूजा से जुड़ी एक प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है। इसमें भक्त मिट्टी से बने विशेष पात्र, जिसे धुनुची कहा जाता है, में जलते नारियल के छिलके, धूप और लोबान आदि रखकर मां दुर्गा की आराधना करते हैं। इसके बाद ढाक की थाप पर हाथों में धुनुची लेकर पारंपरिक अंदाज में नृत्य किया जाता है।बंगाली मान्यताओं के अनुसार, दुर्गा पूजा वह पावन अवसर है, जब मां दुर्गा अपने मायके आती हैं। भक्त इस दौरान मां का स्वागत करते हैं और पूरे उत्साह के साथ उनका उत्सव मनाते हैं। धुनुची नृत्य इसी खुशी, भक्ति और श्रद्धा को प्रकट करने का एक अनूठा तरीका है।धार्मिक अनुष्ठानों में धूप और धुएं का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि धुनुची से उठने वाला सुगंधित धुआं वातावरण को पवित्र करता है और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने का प्रतीक है। यही वजह है कि दुर्गा पूजा के दौरान धुनुची नृत्य को मां के प्रति समर्पण और शुभता के आह्वान से जोड़कर देखा जाता है।
कैसे हुई धुनुची नृत्य की शुरुआत
धुनुची नृत्य की उत्पत्ति को लेकर कई लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, जब देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच भीषण युद्ध हो रहा था, तब देवी की आराधना और शक्ति के आह्वान के लिए भक्तों ने धूप जलाकर पूजा-अर्चना की थी। इसी परंपरा से धुनुची में धूप जलाकर मां की उपासना करने की प्रथा विकसित हुई, जो समय के साथ नृत्य का रूप लेने लगी।हालांकि, इस कथा को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित उत्पत्ति के बजाय एक लोकमान्यता के रूप में देखना चाहिए।ऐतिहासिक दृष्टि से धुनुची नृत्य की शुरुआत की सटीक तारीख बताना मुश्किल है। कुछ मान्यताओं में इसकी परंपरा को 17वीं या 18वीं शताब्दी से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि शुरुआती दौर में दुर्गा पूजा और उससे जुड़े कई भव्य अनुष्ठान जमींदारों तथा संपन्न परिवारों के घरों तक सीमित थे।बाद में जब दुर्गा पूजा का आयोजन बड़े स्तर पर सार्वजनिक पंडालों में होने लगा, तो धुनुची नृत्य भी आम लोगों के बीच लोकप्रिय होता गया। धीरे-धीरे यह बंगाल की दुर्गा पूजा की पहचान बन गया और आज देश-विदेश में आयोजित होने वाले दुर्गा पूजा समारोहों में भी इसे उत्साह के साथ किया जाता है।
क्या है धुनुची नृत्य की खासियत?
धुनुची नृत्य की सबसे बड़ी खासियत इसकी लय, ऊर्जा और भक्तिमय अंदाज है। इसमें नर्तक ढाक की गूंजती थाप के साथ हाथों में जलती धुनुची लेकर अलग-अलग मुद्राओं में नृत्य करते हैं। धुनुची से निकलता धुआं, पारंपरिक वेशभूषा और नर्तकों के लयबद्ध कदम मिलकर एक बेहद आकर्षक दृश्य बनाते हैं।इस नृत्य में हाथों, कमर और पैरों की खास मुद्राओं का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे-जैसे ढाक की थाप तेज होती जाती है, नर्तकों का उत्साह भी बढ़ता जाता है। कई अनुभवी कलाकार एक से अधिक धुनुची के साथ भी नृत्य करते हैं। कुछ लोग मुंह में धुनुची रखकर करतब दिखाने की कोशिश करते हैं, हालांकि इसमें गंभीर रूप से जलने का खतरा होता है और इसे आजमाना सुरक्षित नहीं है।धुनुची नृत्य केवल शारीरिक कौशल का प्रदर्शन नहीं है। भक्तों के लिए यह मां दुर्गा के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करने, पूजा में भागीदारी निभाने और सामूहिक उत्सव का हिस्सा बनने का अवसर भी है।
दुर्गा पूजा में कब किया जाता है धुनुची नृत्य?
धुनुची नृत्य आमतौर पर दुर्गा पूजा के महासप्तमी, महाअष्टमी और महानवमी जैसे महत्वपूर्ण दिनों में किया जाता है। विशेष रूप से संध्या आरती के दौरान इसका आयोजन आकर्षण का केंद्र बनता है।महाअष्टमी और महानवमी के अवसर पर जब पंडालों में पूजा-अर्चना और आरती होती है, तब ढाक की थाप के साथ भक्त धुनुची लेकर मां दुर्गा के सामने नृत्य करते हैं। कई जगहों पर धुनुची नृत्य प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं, जिनमें महिला और पुरुष दोनों बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।इस दौरान पूरा पंडाल ढाक की आवाज, धूप की सुगंध और भक्तों के उत्साह से गूंज उठता है। यह दृश्य बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराओं की जीवंत झलक पेश करता है।
क्या है धुनुची नृत्य का आध्यात्मिक महत्व?
धुनुची नृत्य का आध्यात्मिक महत्व केवल धूप जलाने या नृत्य करने तक सीमित नहीं है। इसे भक्ति, समर्पण, पवित्रता और सामूहिक आनंद की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। धुनुची से उठता धुआं पूजा के वातावरण को सुगंधित बनाता है, जबकि ढाक की थाप भक्तों को उत्सव की लय से जोड़ती है।इस परंपरा में नृत्य करने वाले भक्त अपनी भावनाओं को शब्दों के बजाय संगीत और शारीरिक मुद्राओं के माध्यम से व्यक्त करते हैं। मां दुर्गा के सामने झूमते कदम और हाथों में जलती धुनुची उनकी श्रद्धा तथा उल्लास का प्रतीक बन जाते हैं।धुनुची नृत्य लोगों को एक साथ जोड़ने का काम भी करता है। इसमें उम्र, वर्ग और सामाजिक पृष्ठभूमि से परे जाकर लोग मां दुर्गा की आराधना में शामिल होते हैं। यही वजह है कि यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का भी अहम हिस्सा बन चुकी है।
धुनुची नृत्य क्यों है दुर्गा पूजा की खास पहचान
बंगाल की दुर्गा पूजा अपनी भव्य प्रतिमाओं, आकर्षक पंडालों, पारंपरिक संगीत और अनूठे रीति-रिवाजों के लिए प्रसिद्ध है। इन सभी के बीच धुनुची नृत्य एक ऐसा आयोजन है, जिसमें भक्ति और उत्सव का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।ढाक की थाप पर थिरकते कदम, धुनुची से उठता धुआं और मां दुर्गा के प्रति भक्तों का समर्पण इस परंपरा को खास बनाते हैं। यह केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।यही कारण है कि हर साल दुर्गा पूजा के दौरान धुनुची नृत्य का इंतजार किया जाता है। यह परंपरा याद दिलाती है कि उत्सव की असली खूबसूरती केवल उसकी भव्यता में नहीं, बल्कि उसमें छिपी आस्था, एकजुटता और आनंद की भावना में भी होती है।

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