दुष्यंत कुमार : आक्रोश और आशा के कवि
दुष्यंत कुमार हिंदी के महान कवि और ग़ज़लकार थे, जो अपनी क्रांतिकारी और सामाजिक-राजनीतिक ग़ज़लों के लिए प्रसिद्ध हैं, जिनमें आम आदमी की पीड़ा और व्यवस्था पर तीखा प्रहार मिलता है; उनकी मशहूर ग़ज़लों में 'हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए', 'मत कहो, आकाश में कुहरा घना है', और 'तुम्हारे पाँवों के नीचे कोई ज़मीन नहीं' शामिल हैं, जो आज भी प्रासंगिक हैं और विरोध का स्वर बनी हुई हैं.
पढ़िए इनकी ग़ज़ल : हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

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