DUSU Election में बदले जातीय समीकरण, यश डबास से दीपांशु शौकीन तक दिखी नई तस्वीर
AKANSHA UPADHYAY
दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) चुनाव में इस बार भी जातीय समीकरण चर्चा के केंद्र में रहे। 2026-27 के चुनाव परिणामों में ABVP ने केंद्रीय पैनल की चार में से तीन सीटों अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पर जीत दर्ज की, जबकि उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार और पूर्व NSUI सदस्य दीपांशु शौकीन ने जीत हासिल की। DUSU की राजनीति में लंबे समय से जाट और गुर्जर समुदाय की मौजूदगी को महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। इस बार अध्यक्ष पद की लड़ाई भी इसी पुराने समीकरण के संदर्भ में देखी गई। ABVP के यश डबास ने NSUI के विजय शंकर मीणा को 2,053 वोटों के अंतर से हराया। डबास को 24,576, जबकि मीणा को 22,523 वोट मिले।
अध्यक्ष पद पर टूटा पुराना समीकरण या सिर्फ उम्मीदवारों की पसंद?
DUSU अध्यक्ष पद के चुनावों में जाट और गुर्जर उम्मीदवारों की मजबूत मौजूदगी कोई नई बात नहीं है। पिछले कई वर्षों से इस पद पर इन समुदायों के उम्मीदवारों का प्रभाव दिखाई देता रहा है। इस बार NSUI ने विजय शंकर मीणा को मैदान में उतारकर इस पारंपरिक पैटर्न से अलग जाने की कोशिश की।मीणा राजस्थान से आने वाले आदिवासी समुदाय के छात्र हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उनकी उम्मीदवारी को सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी देखा गया। उनके मुकाबले ABVP ने यश डबास को उतारा, जो कंझावला क्षेत्र से आते हैं। वहीँ उनका मुकाबला बेहद करीबी रहा। काउंटिंग के दौरान कई चरणों तक दोनों उम्मीदवारों के बीच अंतर बेहद कम रहा और एक समय मीणा मामूली बढ़त पर भी थे। अंतिम परिणाम में डबास ने बाजी मारी। इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि अध्यक्ष पद का चुनाव केवल एक सामाजिक पहचान के आधार पर समझना आसान नहीं है। संगठन का कैडर, कॉलेजों में स्थानीय नेटवर्क, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहुंच और विभिन्न सामाजिक समूहों का समर्थन—इन सभी का असर चुनावी परिणाम पर पड़ सकता है।
उपाध्यक्ष पद पर दीपांशु शौकीन ने बदली तस्वीर
इस चुनाव का सबसे बड़ा उलटफेर उपाध्यक्ष पद पर हुआ। पूर्व NSUI सदस्य दीपांशु शौकीन ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और 30,615 वोट हासिल किए। उन्होंने ABVP के ईशु मौर्य को हराया, जिन्हें 16,910 वोट मिले। NSUI के वीर छत्रथ 4,313 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। शौकीन को NSUI का टिकट नहीं मिला था, जिसके बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का फैसला किया। चुनाव प्रचार के दौरान वह नंगे पैर प्रचार करते हुए भी चर्चा में रहे। उनका अभियान छात्र सुरक्षा, हॉस्टल, सस्ती शिक्षा और कैंपस की बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहा।उनकी जीत को केवल संगठन या पारंपरिक जातीय समीकरण से जोड़ना भी पर्याप्त नहीं होगा। शौकीन ने चुनाव के बाद कहा कि उन्हें राजनीतिक रूप से सक्रिय छात्रों के साथ-साथ बड़ी संख्या में सामान्य और गैर-राजनीतिक छात्रों का समर्थन मिला। दिलचस्प बात यह है कि एक निर्दलीय उम्मीदवार की यह जीत DUSU के केंद्रीय पैनल में लंबे अंतराल के बाद हुई। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इससे पहले आखिरी स्वतंत्र उम्मीदवार ने 2009 में केंद्रीय पैनल की सीट जीती थी।
सचिव पद पर रिया छाबड़ी की स्पष्ट बढ़त
सचिव पद पर ABVP की रिया छाबड़ी ने जीत दर्ज की। उन्हें 21,650 वोट मिले, जबकि NSUI की नम्रता चौधरी को करीब 14,900 वोट मिले। रिया की जीत अध्यक्ष पद की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट रही। वह पूरे चुनाव में ABVP के मजबूत प्रदर्शन का हिस्सा रहीं और अंत में बड़े अंतर से विजयी हुईं।रिया छाबड़ी बदरपुर के मोड़बंद गांव से आती हैं और श्री अरबिंदो कॉलेज की छात्रा रही हैं। उनके परिवार की पृष्ठभूमि खेती से जुड़ी बताई गई है। DUSU चुनाव की रिपोर्टिंग में गुर्जर समुदाय की छात्र राजनीति में मौजूदगी का उल्लेख किया गया है। हालांकि, किसी उम्मीदवार की जीत को केवल उसकी जातीय पहचान के आधार पर समझना चुनावी आंकड़ों से सीधे साबित नहीं होता। संगठनात्मक समर्थन और उम्मीदवार की व्यक्तिगत लोकप्रियता भी परिणाम को प्रभावित कर सकती है।
संयुक्त सचिव पद पर राजपूत उम्मीदवार की जीत
संयुक्त सचिव पद पर ABVP के लक्ष्य राज सिंह ने जीत दर्ज की। उन्हें 16,615 वोट मिले, जबकि समाजवादी छात्र सभा के विशेष यादव को 15,778 और NSUI के गोपाल चौधरी को 15,206 वोट मिले। इस सीट पर मुकाबला काफी करीबी रहा। विशेष यादव की मौजूदगी ने भी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाया और वोटों का बंटवारा देखने को मिला।DUSU की राजनीति में राजपूत समुदाय को लेकर भी समय-समय पर चर्चा होती रही है। पिछले वर्षों में इस समुदाय से जुड़े कई छात्र नेताओं ने केंद्रीय पैनल में जगह बनाई है। हालांकि, इस चुनाव में लक्ष्य राज सिंह की जीत को जातीय समर्थन के साथ-साथ ABVP के संगठनात्मक नेटवर्क के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।
यादव उम्मीदवार की चुनौती ने भी खींचा ध्यान
संयुक्त सचिव पद पर समाजवादी छात्र सभा के विशेष यादव की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने 15,778 वोट हासिल किए और दूसरे स्थान पर रहे। उनका प्रदर्शन यह दिखाता है कि DUSU में मुकाबला केवल ABVP और NSUI के बीच सीमित नहीं है। क्षेत्रीय और जातीय पहचान के साथ-साथ अलग-अलग छात्र संगठनों की मौजूदगी भी वोटों को प्रभावित करती है। पिछले वर्षों में यादव समुदाय से जुड़े छात्र नेताओं ने भी DUSU की राजनीति में अपनी जगह बनाई है। इसलिए विशेष यादव का प्रदर्शन इस समुदाय की छात्र राजनीति में संभावित वापसी की चर्चा को जरूर जन्म देता है, हालांकि एक चुनाव के आधार पर किसी दीर्घकालिक राजनीतिक ट्रेंड का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
DUSU में जाति के साथ संगठन और मुद्दे भी अहम
2026 के DUSU चुनाव की सबसे बड़ी तस्वीर यह है कि जातीय समीकरण अभी भी छात्र राजनीति की चर्चा में मौजूद हैं, लेकिन परिणामों को केवल जाति के चश्मे से देखना अधूरा होगा।अध्यक्ष पद पर जाट पहचान वाले यश डबास की जीत, सचिव पद पर रिया छाबड़ी की बड़ी जीत, संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्य राज सिंह की सफलता और उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय दीपांशु शौकीन का भारी अंतर से जीतना—चारों नतीजे अलग-अलग राजनीतिक समीकरण दिखाते हैं। खास तौर पर शौकीन की जीत यह सवाल खड़ा करती है कि क्या DUSU की राजनीति में संगठन से अलग व्यक्तिगत अपील और मुद्दा आधारित राजनीति के लिए भी जगह बढ़ रही है। वहीं, ABVP का तीन सीटों पर कब्जा यह बताता है कि संगठनात्मक नेटवर्क और कैडर की भूमिका अब भी महत्वपूर्ण है।इस बार DUSU चुनाव में छात्र सुरक्षा, हॉस्टल, कैंपस इंफ्रास्ट्रक्चर और शैक्षणिक सुविधाएं भी प्रमुख मुद्दों में रहीं। कुल मतदान 40.46 प्रतिशत रहा।यानी 2026 का DUSU चुनाव एक साथ दो तस्वीरें दिखाता है—एक तरफ लंबे समय से चर्चा में रहे जातीय और क्षेत्रीय समीकरण, तो दूसरी तरफ निर्दलीय उम्मीदवार की बड़ी जीत और छात्र मुद्दों पर केंद्रित अभियान। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि DUSU की राजनीति में इन दोनों धाराओं का प्रभाव किस तरह विकसित होता है।
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