अंडा महँगा! 8-12 रुपये तक कैसे पहुँचे दाम? जानिए वजह

अंडा, जो पहले बजट में एक सस्ता और पौष्टिक प्रोटीन स्रोत माना जाता था, आज उसके दामों ने किसी महँगाई की मिसाल से कम नहीं हो गया है। कुछ इलाकों में अंडा 8 से 12 रुपये प्रति पीस तक बिक रहा है, जिससे आम उपभोक्ता और खासकर गरीब परिवार परेशान हैं। आइए समझते हैं कि अंडे के दाम आसमान क्यों छू रहे हैं और इसके पीछे क्या वजहें हो सकती हैं।

1. फीड (चारे) की लागत में वृद्धि

मुर्गियों का स्वास्थ्य और उत्पादन मुख्यतः उनके चारे पर निर्भर करता है।
पिछले कुछ समय में मक्का, सोयाबीन व अन्य फीड सामग्री के दाम में तेज़ बढ़ोतरी हुई है। चारे महँगा होने से पोल्ट्री मालिक को उत्पादन लागत बढ़ जाती है, जिसे वे अंडों के दाम में बदल देते हैं।

2. ईंधन और लॉजिस्टिक्स खर्च में इज़ाफ़ा

अंडों को फार्म से मंडी या बाजार तक पहुँचाने में ट्रांसपोर्ट खर्च एक बड़ी भूमिका निभाता है।
डीज़ल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतें कुल वितरण लागत को बढ़ा रही हैं, जिससे अंडे के खुदरा दाम भी ऊपर जा रहे हैं।

3. पोल्ट्री फ़्लू और पशु रोगों का असर

कभी-कभी पोल्ट्री फ़्लू या अन्य बैक्टीरियल इंफेक्शन मुर्गियों के उत्पादन को प्रभावित करते हैं और पक्षियों की संख्या कम हो जाती है। इससे उत्पादन कम और मांग ज्यादा होने पर दाम ऊपर जाते हैं।

4. माँग बनाम उत्पादन असंतुलन

त्योहारों, मौसमी मांग और ब्रांड रिकवरी आदि समयों पर लोगों की खाने की आदतें बदल जाती हैं। यदि मांग अचानक बढ़ जाए, जबकि उत्पादन उसी स्तर पर रहे, तो मूल्य को ऊपर धकेल देता है।

5. मुद्रा और आर्थिक दबाव

महंगाई, बैंक ब्याज़ दरों में बदलाव और ग्रामीण क्रय शक्ति कम होने जैसे कारक भी उत्पादन व वितरण प्रणाली पर दबाव डालते हैं, जिसका असर खुदरा मूल्यों पर पड़ता है।

क्या इससे कोई राहत मिलने वाली है?

विश्लेषकों का मानना है कि यदि:

चारे की अंतरराष्ट्रीय/आंतरिक कीमत स्थिर हो जाएं
ईंधन के दाम में गिरावट आये
पोल्ट्री सेक्टर में बेहतर सपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सुविधाएं आएं

तो दाम कुछ हद तक नियंत्रित हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए सरकार और उद्योग दोनों को कदम उठाने होंगे।

उपभोक्ताओं के लिए टिप्स

स्थानीय मंडियों में दामों की तुलना करें
सामूहिक खरीद (Bulk Buy) पर विचार करें
सस्ता प्रोटीन स्रोत जैसे दाल,चना आदि विकल्प इस्तेमाल करें जब दाम बहुत ऊँचे हों

अंडे के दामों में वृद्धि सिर्फ एक ही वजह से नहीं हो रही है-यह चारे की लागत, ट्रांसपोर्ट खर्च, बीमारी जोखिम, तथा मांग व आपूर्ति में असंतुलन इन सबका जटिल परिणाम है।

यह समस्या केवल बाजार की ताकत नहीं बल्कि आपूर्ति श्रृंखला के हर स्तर पर असर डालती जटिल आर्थिक प्रक्रिया है।

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