हमारी ऊर्जा पर सबसे पहला अधिकार हमारा ही होता है। मेलिना चौहान

जलेसर - बाहर की दुनिया में चाहे कितनी भी हलचल क्यों न हो, लोग कुछ भी कहें या करें,सच यही है कि जब तक हम भीतर से अनुमति नहीं देते,तब तक कोई भी हमारे भीतर की शांति और संतुलन को पूरी तरह से नहीं हिला सकता मेलिना चौहान ने बताया  यह बात सुनने में बहुत सरल लगती है, लेकिन जीवन के अनुभवों में इसे समझना थोड़ा कठिन होता है। क्योंकि हम इंसान हैं, और इंसान होने के नाते हमारी भावनाएँ भी होती हैं। कई बार परिस्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं कि हालात हमारे अनुसार नहीं चलते। लोग कुछ ऐसा कह देते हैं या कर जाते हैं जिससे हमारे मन को ठेस पहुँचती है। ऐसे क्षणों में बाहरी विचार और व्यवहार हमें आघात पहुँचा सकते हैं। लेकिन यहाँ एक गहरी सच्चाई छिपी हुई है। अगर हम ध्यान से देखें तो पाएँगे कि दुनिया में किसी भी व्यक्ति के पास इतनी शक्ति नहीं होती कि वह हमारे मन और ऊर्जा को अपनी मर्जी से इधर-उधर कर दे। यह शक्ति वास्तव में हमारे ही हाथ में होती है। जब हम किसी की बातों को अपने दिल में जगह देते हैं,तब ही वे हमारे ऊपर असर डाल पाती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें पत्थर की तरह कठोर बन जाना चाहिए या किसी की बातों से कभी प्रभावित ही नहीं होना चाहिए। बल्कि इसका मतलब यह है कि हमें अपने भीतर की ताकत को पहचानना चाहिए। हमें समझना चाहिए कि हमारी खुशी,हमारा आत्मविश्वास और हमारी मानसिक शांति किसी और की कृपा पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। कभी-कभी हम अनजाने में ही दूसरों को इतनी जगह दे देते हैं कि वे हमारे विचारों और भावनाओं पर असर डालने लगते हैं। हम उनकी बातों को अपने मन में बार-बार दोहराते हैं, उनके व्यवहार के बारे में सोचते रहते हैं और धीरे-धीरे अपने ही मन की शांति खोने लगते हैं। लेकिन अगर हम थोड़ी देर रुककर सोचें तो समझ आएगा कि इस पूरे खेल की चाबी हमारे ही हाथ में थी। अगर कोई हमारे साथ खेल रहा है, हमारी भावनाओं से खेल रहा है, तो कहीं न कहीं हमने ही उसे वह जगह दी है। हमने ही उसे इतना महत्व दिया कि उसकी बातों और व्यवहार ने हमारे मन को प्रभावित करना शुरू कर दिया। इसलिए जिंदगी में सबसे पहली और सबसे जरूरी चीज है – खुद को चुनना खुद को चुनने का मतलब यह नहीं है कि हम स्वार्थी बन जाएँ या दूसरों की परवाह ही न करें। बल्कि इसका मतलब है कि हम अपनी आत्मसम्मान, अपनी शांति और अपनी खुशी को सबसे पहले महत्व दें। जब हम खुद को महत्व देते हैं, तब हम दूसरों के साथ भी बेहतर तरीके से व्यवहार कर पाते हैं। 

मेलिना चौहान कहती है..

जिंदगी का सफर वास्तव में अकेले का सफर होता है। इस रास्ते पर कई लोग मिलते हैं। कुछ लोग थोड़ी दूर तक साथ चलते हैं, कुछ लोग लंबे समय तक हमारे साथ रहते हैं, और कुछ लोग अचानक रास्ते में मिलकर फिर कहीं खो जाते हैं। ये सभी लोग हमारे सफर के साथी हो सकते हैं, लेकिन हमारी मंजिल नहीं होते। मंजिल हमें खुद तय करनी होती है। हमें खुद तय करना होता है कि हमें किस दिशा में आगे बढ़ना है, किन बातों को अपने दिल में जगह देनी है और किन बातों को वहीं छोड़ देना है। जब इंसान अपने भीतर की इस सच्चाई को समझ लेता है,तब वह धीरे-धीरे मजबूत होने लगता है। वह हर बात को दिल पर लेना बंद कर देता है। वह जान जाता है कि दुनिया की हर आवाज उसके लिए जरूरी नहीं है। वह चुनना सीख जाता है कि उसे किसकी बात सुननी है और किसकी नहीं और जब यह समझ आ जाती है, तब जिंदगी थोड़ी हल्की और थोड़ी आसान लगने लगती है। तब हम हालात के गुलाम नहीं रहते, बल्कि अपने विचारों और भावनाओं के मालिक बन जाते हैं। इसलिए जीवन में चाहे कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ क्यों न आएँ,सबसे पहले खुद पर भरोसा रखें। अपने भीतर की ताकत को पहचानें। याद रखें कि आपकी ऊर्जा,आपकी भावनाएँ और आपका आत्मविश्वास आपके ही नियंत्रण में हैं। दुनिया में बहुत लोग मिलेंगे जो आपके सफर में कुछ समय के लिए साथ चलेंगे। लेकिन अंत में रास्ता आपको ही तय करना है और मंजिल भी आपको ही चुननी है। इसलिए सबसे पहले खुद को चुनिए। क्योंकि जब इंसान खुद को चुनना सीख जाता है, तब दुनिया की कोई भी ताकत उसे भीतर से कमजोर नहीं कर पाती।

लेखिका - मेलिना चौहान 

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.