बाल श्रम: विकास की चमक के पीछे छुपा अंधकार, ‘काम नहीं किताबें’ का अधिकार अब भी सपना

एटा : आजादी के 78 साल बाद और तकनीकी विकास व वैश्वीकरण के इस युग में भी करोड़ों बच्चे कलम की जगह औजार थामने को मजबूर हैं। विकास की चमकदार तस्वीर के पीछे वह अंधकार छुपा है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं - बाल श्रम। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार आज भी विश्व भर में करोड़ों बच्चे बाल श्रमिक के रूप में काम कर रहे हैं और इनका एक बड़ा हिस्सा खतरनाक परिस्थितियों में जान जोखिम में डाल रहा है।  

बचपन छिन रहा, भविष्य अंधकारमय  
बाल श्रम केवल बच्चों से उनका बचपन नहीं छीनता, यह उनके शारीरिक, मानसिक और लैंगिक विकास की नींव भी हिला देता है। जो बच्चे पढ़-लिखकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक बनकर अपना और देश का भविष्य उज्ज्वल कर सकते थे, वे आज खेतों, ईंट-भट्टों, ढाबों, कारखानों और घरों में झाड़ू-पोंछा करते नजर आते हैं। काम के दौरान होने वाला जोर-जुल्म, चोट और शोषण उनके कोमल मन पर ऐसा घाव छोड़ जाता है जो उम्र भर नहीं भरता।  

शिक्षाविद मानते हैं कि बाल श्रम शिक्षा की सबसे बड़ी बाधा है। जब हाथ में स्लेट-पेंसिल की जगह हथौड़ा और तसला आ जाए तो स्कूल का रास्ता अपने आप बंद हो जाता है। परिणाम - अंधकारमय भविष्य और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती गरीबी का चक्र।  

कागजी अभियान, जमीन पर मौन  
कई जिलों में बाल श्रम उन्मूलन के लिए बड़े-बड़े अभियान, समितियां और मोटी तनख्वाह वाले अधिकारी हैं। लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। महज कागजों पर फाइलें दौड़ती हैं, फोटो खिंचती हैं, पर खेतों और भट्टों से मासूमियत नहीं मिटती। संबंधित विभाग सब कुछ देखते हुए भी अक्सर आंखें मूंद लेता है। शिकायत मिलने पर भी कार्रवाई की रफ्तार इतनी धीमी कि तब तक बच्चा एक और साल श्रम की भट्टी में झोंक दिया जाता है।  

जड़ में क्या है?  
विशेषज्ञों के अनुसार बाल श्रम की जड़ में 4 कारण हैं:  

1. गरीबी: जब परिवार की रोटी का संकट हो तो माता-पिता के सामने सबसे आसान विकल्प बच्चे को काम पर भेजना बन जाता है।  
2. शिक्षा की कमी और सामाजिक असमानता: स्कूल दूर हैं, गुणवत्ता नहीं है, तो शिक्षा प्राथमिकता नहीं बन पाती।  
3. बेरोजगारी: परिवार के बड़े बेरोजगार हों तो बच्चे ही कमाने वाले बन जाते हैं।  
4. कानून का शिथिल क्रियान्वयन: बाल श्रम निषेध अधिनियम है, पर सख्ती और निगरानी का अभाव है।  

समाधान का रास्ता: ‘काम नहीं किताबें’  
हमें ऐसे विश्व का निर्माण करना है जहां काम नहीं, किताबें बच्चों का अधिकार हों। सरकार के सर्वशिक्षा अभियान, राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना और मुफ्त शिक्षा जैसे प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन इन्हें समाज के अंतिम छोर तक ले जाना होगा।  

इसके लिए तीन स्तरों पर काम जरूरी है:  
1. सरकार और प्रशासन: छापेमारी के साथ पुनर्वास पर जोर। पकड़े गए बच्चों को तुरंत स्कूल, पोषण और कौशल प्रशिक्षण से जोड़ा जाए। लापरवाह अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो।  
2. समाज: जनजागरण अभियान चलाकर हर नागरिक को ‘बाल श्रम मुक्त क्षेत्र’ का संकल्प दिलाना होगा। उपभोक्ता के रूप में भी हम यह देखें कि जो सामान खरीद रहे हैं, वह बाल श्रम से तो नहीं बना।  
3. परिवार: माता-पिता को समझाना होगा कि आज बच्चे की कमाई से घर का चूल्हा जल सकता है, पर कलम से पूरे परिवार का भाग्य बदलेगा।  

बाल श्रम केवल बच्चों की भलाई का मुद्दा नहीं, संपूर्ण मानवता का सवाल है। हर बच्चे को सुरक्षित, स्वस्थ और गरिमापूर्ण बचपन मिलना उसका मौलिक अधिकार है। निष्पक्ष, संवेदनशील और सतत रणनीतियों से ही हम इस अंधकार को मिटाकर देश के भविष्य की नींव मजबूत कर सकते हैं। तभी ‘काम नहीं किताबें’ का नारा कागज से उतरकर हकीकत बनेगा।

रिपोर्टर : लखन यादव 

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