खेतों में बुवाई का वक्त, लेकिन सकरौली रजवाहे में पानी का संकट! सफाई के नाम पर खानापूर्ति के आरोप, किसानों ने उठाए सवाल

एटा : किसान जब खेत में बीज डालता है तो उसके साथ अपनी उम्मीदें भी बोता है। उसे उम्मीद रहती है कि समय पर खाद मिलेगी, बिजली उपलब्ध होगी और सिंचाई के लिए पानी भी मिलेगा। मगर जब खेती के सबसे महत्वपूर्ण समय में सिंचाई व्यवस्था ही सवालों के घेरे में आ जाए तो किसान की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। जलेसर तहसील क्षेत्र में सकरौली रजवाहे की बदहाली इन दिनों इसी परेशानी की कहानी बयां कर रही है। कहीं रजवाहे में कचरा जमा है तो कहीं झाड़ियों ने किनारों को घेर रखा है। किसानों की शिकायत है कि सफाई समय से नहीं होने और पानी का समुचित प्रवाह न रहने के कारण रजवाहे का पानी टेल तक नहीं पहुंच पा रहा। आलू की बुवाई का सीजन चल रहा है। इस दौरान खेतों की तैयारी और सिंचाई के लिए पानी की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे में सकरौली रजवाहे की सफाई में देरी किसानों के लिए चिंता का विषय बन गई है। किसानों का कहना है कि दीपावली का त्योहार निकल गया, लेकिन रजवाहे की सफाई अब तक पूरी नहीं हो सकी। विभागीय मशीनें कुछ स्थानों पर काम कर रही हैं, मगर कई हिस्सों में गंदगी और झाड़ियां बनी हुई हैं। बावली गांव के पास पुल पर कचरे का ढेर, झाड़ियों से घिरा रजवाहा सकरौली रजवाहे की बदहाली का एक उदाहरण हाथरस जनपद के बावली गांव के निकट पुल पर देखने को मिल रहा है। यहां रजवाहा गंदगी और कचरे से पटा पड़ा है। दोनों किनारों पर झाड़ियां खड़ी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय से समुचित सफाई नहीं होने के कारण आसपास का क्षेत्र भी प्रभावित हो रहा है। झाड़ियों में जहरीले जीव-जंतुओं के छिपे रहने की आशंका से ग्रामीणों में भय बना रहता है।

बावली, नगला बम्बी, नगवाई, नगला मितन और शाहघड़ी समेत आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के किसान इस रजवाहे और उससे जुड़ी सिंचाई व्यवस्था पर निर्भर हैं। किसानों के मुताबिक पानी की आपूर्ति का लाभ अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पा रहा। इससे उन किसानों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं जिनके खेत रजवाहे के अंतिम हिस्से में हैं। सिमराऊ और सोना माइनर की सफाई पर भी सवाल सिर्फ मुख्य रजवाहा ही नहीं, सिमराव माइनर और सोना माइनर की सफाई व्यवस्था को लेकर भी किसानों ने सवाल उठाए हैं। किसानों का आरोप है कि शासन के निर्देश पर साल में एक बार सफाई कराई जाती है, लेकिन कई स्थानों पर यह काम गुणवत्तापूर्ण तरीके से नहीं होता। सफाई के नाम पर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है और झाड़ियां पूरी तरह नहीं हटाई जातीं नगवाई साइट पर भी सफाई कार्य को लेकर शिकायतें सामने आई हैं। किसानों का कहना है कि ठेकेदारी व्यवस्था में काम की नियमित निगरानी जरूरी है। यदि अधिकारी मौके पर पहुंचकर सफाई की गुणवत्ता की जांच नहीं करेंगे तो सरकारी खर्च का वास्तविक लाभ किसानों तक कैसे पहुंचेगा इस मामले में यह भी महत्वपूर्ण है कि सफाई के कार्य की लंबाई, मशीनों की उपलब्धता और पूरे क्षेत्र में किए गए काम का सत्यापन किया जाए। केवल कुछ स्थानों पर मशीन चलाने से पूरे रजवाहे की समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
 खाद, पानी और बिजली के बीच उलझा किसान इस समय किसानों के सामने एक साथ कई चुनौतियां हैं। आलू की बुवाई के लिए खाद की जरूरत है, खेतों की तैयारी के लिए पानी चाहिए और नलकूप चलाने के लिए बिजली। खाद की उपलब्धता को लेकर किसानों की परेशानी पहले से चर्चा में है। अब सिंचाई व्यवस्था की बदहाली ने उनकी चिंता और बढ़ा दी है। भारतीय किसान यूनियन भानू के अनार सिंह पप्पू व भारतीय किसान यूनियन चौधरी चरण सिंह के प्रदेश सचिव रामगोपाल बघेल ने सिंचाई और बिजली विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि किसानों को नलकूपों के लिए 10 घंटे बिजली देने के आदेश हैं, लेकिन वास्तविकता में छह, सात और कभी-कभी आठ घंटे ही बिजली मिल पा रही है। उन्होंने कहा कि एक तरफ रजवाहे में पानी टेल तक नहीं पहुंच रहा और दूसरी तरफ नलकूपों के लिए भी पर्याप्त बिजली नहीं मिल रही। ऐसे में किसान अपनी फसलों की सिंचाई कैसे करेगा? खेती के इस महत्वपूर्ण समय में किसान को विभागीय व्यवस्थाओं के भरोसे छोड़ दिया गया है। रामगोपाल बघेल ने कहा कि किसान पहले से ही महंगे खाद, बीज और अन्य कृषि खर्चों से परेशान है। यदि समय पर सिंचाई नहीं हुई तो फसल की लागत और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने संबंधित अधिकारियों से किसानों की समस्याओं का तत्काल समाधान कराने की मांग की है। सफाई में देरी पर सिंचाई विभाग ने क्या कहा?
रजवाहे की सफाई में देरी और किसानों की शिकायतों के संबंध में सिंचाई विभाग के एसडीओ खूब सिंह ने बताया कि रजवाहे में पानी छोड़ दिया गया था, जिसके कारण सफाई कार्य में देरी हुई। उन्होंने कहा कि 12 नवंबर के आसपास पोकलेन मशीनें लगाकर सफाई कार्य में तेजी लाई जाएगी। एसडीओ के अनुसार सकरौली टेल की तरफ चार से पांच किलोमीटर लंबे हिस्से में जेसीबी मशीन से सफाई कराई जा रही है। पूरे रजवाहे की सफाई नवंबर माह के अंत तक पूरी करा दी जाएगी। विभाग का कहना है कि मशीनों के माध्यम से सफाई का काम तेजी से कराया जाएगा। हालांकि किसानों की असली चिंता सिर्फ सफाई पूरी होने तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि सफाई के बाद रजवाहे में पानी का प्रवाह भी सुनिश्चित हो और खेतों के अंतिम छोर तक सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी पहुंचे। सरकारी व्यवस्था और जमीनी हकीकत के बीच कितना फासला? सकरौली रजवाहे की स्थिति कई बुनियादी सवाल खड़े करती है। यदि रजवाहों की सफाई के लिए हर साल व्यवस्था की जाती है तो फिर दीपावली तक सफाई पूरी क्यों नहीं हो सकी? क्या सफाई कार्य की निगरानी नियमित रूप से होती है? क्या ठेकेदारों को भुगतान से पहले काम की गुणवत्ता का सत्यापन किया जाता है? क्या अधिकारियों ने बावली गांव के निकट पुल और नगवाई साइट का निरीक्षण किया है?
इन सवालों का जवाब मिलना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सिंचाई व्यवस्था सीधे किसानों की आजीविका से जुड़ी है। खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए केवल रजवाहे में पानी छोड़ना पर्याप्त नहीं है। उसकी सफाई, जल प्रवाह, माइनरों की स्थिति और अंतिम छोर तक वितरण की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
 नवंबर के अंत तक सफाई का दावा, किसानों को इंतजार सिंचाई विभाग के एसडीओ खूब सिंह ने नवंबर के अंत तक सफाई पूरी कराने का भरोसा दिया है। अब किसानों की निगाहें 12 नवंबर के बाद शुरू होने वाले प्रस्तावित मशीनों के कार्य और महीने के अंतिम सप्ताह तक निर्धारित लक्ष्य पर टिकी हैं। किसानों की मांग है कि विभाग बावली, नगला बम्बी, नगवाई, नगला मितन और शाहघड़ी सहित प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण करे। सिमराव और सोना माइनर की भी पूरी सफाई कराई जाए। पुलों के पास जमा कचरे को हटाया जाए और टेल तक पानी पहुंचने की स्थिति की जांच की जाए। साथ ही बिजली विभाग किसानों को निर्धारित अवधि के अनुसार बिजली उपलब्ध कराए। आखिरकार सवाल वही है कि जब किसान को बुवाई के समय पानी की जरूरत है तो उसे महीने के अंत तक इंतजार क्यों करना पड़े? खेती मौसम के हिसाब से चलती है, विभागीय कैलेंडर के हिसाब से नहीं। किसानों को आश्वासन नहीं, समय पर पानी और बेहतर सिंचाई व्यवस्था चाहिए। अब देखना होगा कि नवंबर के अंत तक विभाग अपना वादा पूरा कर पाता है या सकरौली रजवाहे की समस्या एक बार फिर अगली फसल के मौसम तक खिंचती रहेगी।

रिपोर्टर : लखन यादव

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