रहमदिल रूना ने लाखों गरीबों का जीवन संवारा
एटा : आज से आठ दशक पहले वह इलाका हमारे मुल्क का ही हिस्सा था। उसकी बदनसीबी यह रही कि उसके हिस्से दो विभाजन आए। पहला सन् 1947 में और दूसरा 1971 में। अफसोस ! दोनों बंटवारों में इसके बहुत सारे बाशिंदों को यही एहसास सौंपा कि वे बड़े ठग गए। उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया था, मगर इस कयामत का रहबर कहां किसी को बेसहारा छोड़ता है ? इंसान के रूप में वह अपने फरिश्तों को दीन-दुखियों के बीच भेजता रहता है। बांग्लादेश में हाशिये के लोगों के बीच रूना खान का रुतबा किसी फरिश्ते जैसा ही है। रूना को हाल ही में प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे सम्मान से सम्मानित किया गया है।
आज से करीब 67 साल पहले ढाका के एक अत्यंत धनाढ्य परिवार में रूना पैदा हुईं। मां बांग्ला सल्तनत के करानी वंश से वाबस्ता थीं, तो पिता अलीम खान एक बड़े जमींदार खानदान के वारिश थे। अलीम एक सेकुलर मिजाज इंसान थे। जमाने के तमाम मशहूर कलाकार, अजब से जुड़ी बड़ी हस्तियां, राजदूत, मौलवी, पुजारी और बौद्ध भिक्षु उनके मेहमान हुआ करते। इसी खुले माहौल में रूना की परवरिश हुई। जब होश संभाला, तो उन दिनों ढाका की सबसे प्रतिष्ठित निजी स्कूलों में से एक 'फॉर्म व्यू इंटरनेशनल स्कूल' में रूना का दाखिला कराया गया। जब हाईस्कूल की पढ़ाई का वक्त आया, तो परिवार ने पाकिस्तान के खूबसूरत हिल स्टेशन मरी स्थित सेंट डेनिस हाईस्कूल को उनके लिए चुना। बांग्लादेश जिस वक्त पाकिस्तान से अपनी आजादी की जंग लड़ रहा था, रूना पाकिस्तानी स्कूल के हॉस्टल में थीं।
हाईस्कूल के बाद कॉलेज की बारी थी। जाहिर है, रूना अब इस्लामाबाद का रुख नहीं कर सकती थीं। उनका नया ठिकाना कलकत्ता (अब कोलकाता) का लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज बना, जहां से उन्होंने भूगोल में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसी बीच 19 साल की उम्र में उनका निकाह हो गया। हालांकि, पढ़ने-लिखने में उनका मन ऐसा रमा था कि वतन वापसी के बाद उन्होंने ढाका के ईडन महिला कॉलेज से मानविकी में भी स्नातकोत्तर किया। शादी के बाद जिंदगी में एक नया मोड़ ले लिया था। वह जल्द ही दो बेटों की मां बन गईं। फिर उन्हें अपने बारे में सोचने का मौका ही कहां मिलने वाला था? हालात ऐसे बने कि कुछ ही वर्षों में तलाक हो गया। रूना अपने दोनों बेटों के साथ पिता के घर वाली आईं। घुम-घुम के हवाले से तो कोई फिक्र नहीं थी, मगर जिंदगी में बेमकसद जीना गवारा न था।
तब वह उम्र की तीसरी दहाई छू रही थीं। तमाम सहूलियतों के बीच पली-बढ़ी रूना ने तब तक गरीबों को देखा जरूर था, मगर सच में गरीबी क्या होती है, इसका एहसास न था और एक बार जब इसका शिद्दत से एहसास हुआ, तो उन्होंने यह भी पाया कि इसका सबसे अधिक शिकार औरतें बनती हैं। रूना ने खासोश तमाशाई बने रहने से इनकार कर दिया। साल 1988 में उन्होंने ऐसी औरतों की मदद के लिए एक बुटीक की शुरुआत की और इसमें विधवा-बांग्लादेशी और स्थानीय गरीब औरतों को काम देना शुरू किया। एक बार जब बांग्लादेश के अलग-अलग हिस्सों की गरीबी उघड़नी शुरू हुई, तो फिर इसकी हैरानकुन परतें रून पर खुलती चली गईं।
यह वह समय था, जब इब्र में नाम के फ्रांसीसी पायलट और नाविक फ्रांस में रिटायर कर दिए गए एक मालवाहक जहाज को मानवीय मदद के इरादे से बांग्लादेश तक लेकर आए थे। वह रूना के पिता अलीम खान को उसे सौंपकर फ्रांस लौट जाने वाले थे, मगर अलीम ने उनसे कहा, हमारे मुल्क में स्वास्थ्य सेवाओं की बड़ी कमी है। आप इसे एक क्लीनिक के रूप में क्यों नहीं तब्दील कर देते ? रून ने मुलाकात के बाद मेरे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने शादी का प्रस्ताव रखा, मगर रूना को शर्त थी कि उन्हें बांग्लादेश में ही रहना होगा और बच्चे नहीं पालेंगे। शादी भी हुई और रूना तीसरे बेटे की मां बनीं। जब पति-पत्नी हमख्याल हों, तो तवील सफर भी आसान हो जाता है। साल 2002 में रूना और मरे ने मिलकर 'फ्रेंडशिप' एनजीओ की शुरुआत की। रूना ने बांग्लादेशी द्वीपों पर बसे लोगों तक चिकित्सा सुविधा पहुंचाने के लिए अपने पति के साथ मिलकर एक तैरते हुए अस्पताल की शुरुआत की। ये वे द्वीप हैं, जिन पर ढाका अपना संप्रभु अधिकार जताता है, मगर उसने वहां के बाशिंदों के नागरिक अधिकारों का कभी ख्याल नहीं किया। कई द्वीपों के बाशिंदों के पास एक नाव तक न थी, ताकि वे अपने देश की मुख्य भूमि से जुड़ सकें। रूना ने उन द्वीपों को नाव, स्कूल, अस्पताल मुहैया कराए। बल्कि उन्हें प्रेरित किया कि वे अपने बच्चों को पढ़ाएं-लिखाएं, काबिल बनाएं।
वह काम आसान न था, क्योंकि वे ऐसे द्वीप थे, जहां तब पूरी अराजकता थी। लोग उन दिनों 500 टके के लिए एक-दूसरे को मार डालते थे। उन द्वीपों पर सेवा देने के लिए डॉक्टर-नर्स भी तैयार नहीं थे। कोई जमानत भी इस काम के लिए रूना की मदद करने को तैयार न था। वह अडिग रहने की तरह डटी रहीं। पति और परिवार ने पूरा साथ दिया। पिछले 24 सालों में रूना ने इन रेतीले द्वीपों के बाशिंदों की जिंदगी पूरी तरह बदल दी है। इनके गांव सीर रोशनी से जगमगा रहे हैं, बच्चे पढ़ रहे हैं, मरीजों को इलाज मिल रहा है।
आज रूना का फ्रेंडशिप संगठन न सिर्फ सात जहाज-चिकित्सालय, दो जमीनी अस्पताल और 550 मोबाइल क्लीनिक संचालित कर रहा है, बल्कि इसमें 10,000 से ज्यादा वॉलंटियरों को बचाव एवं राहत कार्यों के ट्रेनिंग दी है, सतत आर्थिक विकास जोन के जरिये इसने दो लाख से अधिक लोगों को नौकरियां मुहैया कराई हैं। अस्पतालों, स्कूलों, जलवायु परिवर्तन से जूझे अभियानों और सेज के जरिये बांग्लादेश की लगभग 75 लाख जिंदगियां आज रूना की बदौलत संवर-निखर रही हैं !
रिपोर्टर : लखन यादव
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