मां-बाप या परिजन बच्चों की खतरनाक जिद के आगे बेबस और लाचार क्यों..?

एटा : दुर्घटनाओ में दर्दनाक मौते बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है तो वहीं अभिभावकों के सामने भी कुछ ऐसे प्रश्न खड़े करती है जिन पर सोचना नितांत आवश्यक हो गया है यह कई बालक अपने परिवार के इकलौते चिराग बताए जाते हैं और एक दुर्घटना का शिकार होकर हमेशा के लिए बुझ जाते है इन मामलों में बहुत चिंतन की जरूरत है! एक समय था जब युवाओं के अंदर मोटरसाइकिल खरीदने एवं चलाने का जबरदस्त क्रेज था ऐसा नहीं है कि यह क्रेज अब खत्म हो गया है अभी भी यह क्रेज हैं लेकिन कम उम्र के नाबालिक बच्चे मासूम उम्र में दुपहिया तथा दोपहिया वाहन खुले आम लेकर घूमते हैं इतना ही नहीं परिवार के बहुत से सदस्य इन वाहनों पर सवार होकर शान के साथ चलते हैं और खुश होते हैं इन्हें लगता है कि शायद बच्चे बड़े हो गए हैं जबकि ऐसा नहीं है बच्चे मासूम है अपनी जिद के आगे मां-बाप एवं परिजनों को आसानी से झुका लेते हैं लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मां-बाप या परिजन बच्चों की खतरनाक जिद के आगे बेबस और लाचार क्यों हो जाते हैं आज शहरों के अंदर बड़ी संख्या में ऐसे मासूम बच्चे स्कूटी मोटरसाइकिल और यहां तक की बुलेट व कार को भी तेजी के साथ चलाते हुए सड़कों पर नजर आ जाएंगे क्या अभिभावकों की नजर अपने इन लगते जिगर पर नहीं पड़ती?क्या उन्हें इस बात का खतरा महसूस नहीं होता कि उनके बच्चे किसी दुर्घटना का शिकार हो सकता है? क्या इतनी कम उम्र में उनको जान जोखिम में डालकर वाहन देना सही है ? क्या अभिभावक अपनी जिम्मेदारी को सही ढंग से निभा रहे हैं !! असल बात यह है कि बिल्कुल नहीं निभा रहे हैं अपनी जिम्मेदारी से विमुख हो रहे हैं जिन्हें बच्चों के हाथों में कलम होनी चाहिए संस्कारों की पाठशाला का ज्ञान अर्पित होना चाहिए वहां पर मोटरसाइकिल दौड़ा रहे है तथा बेवजह मौत का शिकार हो रहे है सरकार द्वारा यातायात के नियमों की अवहेलना पर चालान राशि कई गुना बढ़ा दी गई है। सरकार का यह फैसला ऐसे कदमों को कहां तक रोकेगा यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना अवश्य है कि मां-बाप अपनी जिम्मेदारी बेहतर ढंग से बिल्कुल नहीं निभा रहे हैं महावीर चौक पर हुई घटना एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करती है तथा सोचने पर विवश करती है मासूम बच्चों को इस प्रकार के वाहन क्यों आसानी से उपलब्ध कराए जा रहे हैं इसका

रिपोर्टर : लखन यादव

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