दूर प्रदेशों तक है जलेसर के सिंघाड़े की मिठास

एटा :  1200 से ज्यादा हेक्टेयर में हो रही खेती, एटा-कासगंज ही नहीं दूर प्रदेशों की मंडियों में पहुंच रही फसल,मिठास से मजबूत होगी किसानों की आर्थिक स्थिति इस बार औसत बारिश ने जलेसर क्षेत्र के सिंघाड़ा उत्पादक किसानों के चेहरों पर मुस्कान लौटा दी है। जलेसर और अवागढ़ क्षेत्र के करीब पांच दर्जन गांवों में लगभग 1200 हेक्टेयर में सिंघाड़े की खेती हो रही है। फसल बाजार में पहुंचने लगी है।फिलहाल अच्छा मूल्य मिलने से किसानों के जीवन में भी बेहतर आर्थिक की की मिठास घुल रही है। अक्टूबर की शुरुआत से ही जलेसर क्षेत्र का सिंघाड़ा एटा-कासगंज के अलावा दिल्ली, आगरा, जयपुर, इंदौर, चंडीगढ़ और गुड़गांव की मंडियों में भी यहां का सिंघाड़ा भेजा जा रहा है। करीब तीन दशक पहले मल्लाह समुदाय के लोगों ने तालाबों और गड्ढों से इस खेती की शुरुआत की थी। अब यह क्षेत्र के किसानों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन बन गई है। पिछले दो दशक से खेतों में भी सिंघाड़े का उत्पादन व्यापक स्तर पर हो रहा है। खास बात तो यह है कि अब बड़े किसान भी वर्षों से इस खेती को बेहतर आर्थिक लाभ का साधन मानकर रुचि ले रहे हैं। इस साल भी सिंघाड़े की फसल के लिए जरूर से भी अधिक बारिश होने की स्थिति में अच्छा उत्पादन माना जा रहा है।

इन गांवों में मीठे सिंघाड़े का उत्पादन
 
जलेसर तहसील क्षेत्र के  गांव पिलखतरा, मीसाकलां, मीसा खुर्द, पुन्हेरा,खेरिया ताज, खेरिया, सुर्जी, पौंडरी, नरोरा, नगला छैया, नूंहखास, कसबा, नूंहखेड़ा, नगला बख्ती, नगला केसरी, नगला वसु, लालगढ़ी, हदीदादपुर, नगला चांद, खेड़िया खाती, अब्दुल हईपुर, पिलखतरा, खेड़िया, उल्लदापुर, बलसेरा, नरहुली, बढ़ावली, रेजुआ, नगला चंदन, नगला गोपाल, बलीदादपुर, मंडनपुर, मकसूदपुर, खुशरई और अभय राजपुर सहित कई गांवों में सिंघाड़े की खेती की जा रही है। सभी क्षेत्र मीठे सिंघाड़े के हैं।

यह प्रजातियां है खास 

एटा जिले में सिंघाड़े की पारंपरिक लाल और हरी कांटेदार प्रजातियां  सबसे ज्यादा प्रचलित हैं। यह प्रजाति ट्रैपा नैटन्स या ट्रैपा बिसपिनोसा के अंतर्गत आती है। अच्छे उत्पादन के साथ मिठास बेहतर होती है।

लागत भी कम और उत्पादन ज्यादा 

सिंघाड़ा उत्पादन में लागत की बात की जाए तो परंपरागत खेती करने वाले किसानों के लिए जहां बेल में खर्चा नहीं करना पड़ता। पानी की उपलब्धता बनाए रखने के अलावा रोगों से बचाव चुनौती होता है। प्रति हेक्टेयर 6000 से का खर्चा आता है। इसके आवाज में 20 से 25 कुंतल प्रति हेक्टेयर की फसल मिलती है। सबसे ज्यादा खर्चा मजदूरी और परिवहन में खर्च होती है। 
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हर सिंघाड़े पर ही ज्यादा फोकस 

एटा जनपद खासकर जलेसर क्षेत्र के किसान हरे सिंघाड़े की बिक्री पर ही निर्भर है। जिले में सिंघाड़े की मंडी और सूखा सिंघाड़ा तैयार करने की सुविधा न होने के कारण मंदिरों में बिक्री कर फसल का निपटारा नकदी फसल के रूप में करते हैं। पिछले साल 1400 से 2200 रुपए कुंतल तक के भाव मिले और इस बार अक्टूबर की शुरुआत से सिंघाड़ा 2200 से 2900 रुपए तक बिका है। जैसे-जैसे फसल बढ़ेगी मूल्य भी कम होंगे। दीपावली तक यहां के सिंघाड़े का स्वाद मिलता रहेगा। उत्पादन के साथ किसानों की आर्थिकी मंडी भाव पर निर्भर रहती है।

पोषक तत्वों से भरपूर है सिंघाड़ा 

वरिष्ठ चिकित्सक डॉ राहुल यादव बताते हैं कि सिंघाड़ा स्वाद के साथ सेहत के लिए खास है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, पोटैशियम और कुछ मात्रा में विटामिन एवं खनिज पाए जाते हैं।  शरीर को ऊर्जा,पाचन में मददगार, हृदय स्वास्थ्य के लिए उपयोगी, ग्लूटेन-मुक्त, वजन नियंत्रित रखने में सहायक होने के अलावा मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र के लिए उपयोगी है। दूषित जल में उगे सिंघाड़े को बिना उचित सफाई और सुरक्षित तैयारी के नहीं खाना चाहिए।

किसानों की बात

 10 साल से खेती कर रहे हैं, अच्छे उत्पादन के बावजूद उतना लाभ नहीं मिल पाता क्योंकि काफी खर्चा फसल के परिवहन में हो जाता है।जिले में सिंघाड़े की मंडी स्थापित होने से परिवहन खर्च घटेगा और उपज बेचने में सुविधा मिलेगी। इस बार अच्छे लाभ की उम्मीद है। पवन ठाकुर,किसान
- जिले की मुख्य फसल सिंघाड़ा होने के बावजूद भी बीज, खाद और अन्य कृषि संसाधनों पर सहायता मिले तो खेती का दायरा बढ़ सकता है। सिंघाड़े की मिठास और गुणवत्ता को पहचान दिलाने की जरूरत है।रामेश्वर दिवाकर,किसान

रिपोर्टर : लखन यादव 

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