सदियों की उपेक्षा के बाद अब तीन राज्यों को मिलाकर गूंजी 'चम्बल प्रदेश' की ऐतिहासिक मांग, बीहड़ की माटी में जागा नया स्वाभिमान
इटावा : चम्बल के खामोश और उपेक्षित कहे जाने वाले बीहड़ों में अब डर की नहीं, बल्कि विकास, अधिकार और स्वाभिमान की एक ऐसी दहाड़ती बयार बह रही है, जिसने सदियों के दर्द को पीछे छोड़ते हुए एक नए भविष्य की इबारत लिख दी है। 'मिशन चम्बल घाटी जन जागरण यात्रा' जब रविवार को इटावा के ग्रामीण आंचल—विक्रमपुर, नगला कदोरी, मिहोली, घड़िया और झरोली—की माटी पर पहुंची, तो वहां सिर्फ राजनीतिक संवाद नहीं हुआ, बल्कि चम्बल के हर दिल में सुलगती उम्मीदों का एक भावुक और आत्मीय सैलाब उमड़ पड़ा।
किसान नौजवान मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं मध्य प्रदेश के दिमनी से पूर्व विधायक रविन्द्र सिंह तोमर ‘भिड़ौसा’ के नेतृत्व में जब गांवों के चौपालों पर किसानों, युवाओं और माताओं-बहनों से सीधा संवाद हुआ, तो हवा में सिर्फ एक ही गूंज थी—अब और नहीं, अब हमें हमारा अपना ‘चम्बल प्रदेश’ चाहिए! यह यात्रा उन चेहरों की चीख और पुकार है, जिन्होंने बरसों से उपेक्षा का अंधेरा झेला है, लेकिन अब बीहड़ के सीने को चीरकर विकास का नया सूरज उगने की जिद ठान ली है।
गांवों की इस पावन माटी पर उठी मांगें सिर्फ नारे नहीं, बल्कि चम्बल के हर घर की वो कसक हैं जिन्हें वर्षों से अनसुना किया गया। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के चम्बल से जुड़े जिलों को मिलाकर एक स्वतंत्र ‘चम्बल प्रदेश’ के गठन का संकल्प अब हर युवा की जुबान पर है। चम्बल, यमुना, क्वारी, सिंध, बेतवा और कूनो जैसी पवित्र नदियों के आंचल से नियमानुसार वैधानिक रेत खनन की व्यवस्था कर स्थानीय युवाओं को रोजगार से जोड़ने की गुहार हो, या फिर बीहड़ की बंजर भूमि को उद्योग-धंधों से आबाद करने का सपना—हर एक शब्द में दिलों को छू लेने वाली संवेदनशीलता साफ झलक रही थी।
किसानों के आंसुओं को पोंछने और आवारा पशुओं के आतंक से निजात पाने के लिए सरकारी भूमि पर 'राष्ट्रीय गौ अभयारण्य' स्थापित करने की मांग ने तो ग्रामीण आंचल के हर कोने को भावुक कर दिया। इसके साथ ही, अपना पूरा जीवन देश और समाज की सेवा में झोंक देने वाले सरकारी कर्मचारियों के हक के लिए 'पुरानी पेंशन व्यवस्था' की बहाली की गूंज ने इस जन-जागरण को और अधिक धारदार और संवेदनशील बना दिया।
क्षेत्रपाल सिंह तोमर, प्रताप सिंह भदौरिया, उपेंद्र भदौरिया और संतोष पांडे समेत तमाम गणमान्य नागरिकों और जुझारू कार्यकर्ताओं के समर्थन से आगे बढ़ रही यह यात्रा अब रुकने वाली नहीं है। चम्बल का बच्चा-बच्चा अब अपनी माटी के विकास के लिए जाग चुका है और यह हुंकार अब तब तक शांत नहीं होगी, जब तक बीहड़ की इस पावन धरती को उसका छीना हुआ गौरव और विकास का मुकम्मल आसमान नहीं मिल जाता!
रिपोर्टर : देवेन्द्र सिंह

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