गांव में होकर भी गांव ढूढ़ते हैं।

गांव में होकर भी गांव ढूढ़ते हैं।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है ,किन्तु कुछ परिवर्तन ऐसे होते हैं जो बहुत ज्यादा खलते हैं जिसके परिवर्तन से बहुत कुछ खो जाता है .जैसे कि गांवों में अब पहले जैसी वो शाम नहीं देखने को मिलती हैं ,ना ही शाम को गोधूलि देखने को मिलती है . जिस कारण गांव में होकर भी हम उस गांव की खोज में लगे रहतें हैं जो कई वर्ष पहले हुआ करता था। जो बदलते वक्त के साथ बदल गया , जो अब ना तो पूरी तरह से गांव रहा और ना ही शहर . अब गांवो में पहले जैसी पीपल की वो ठंडी छाव मिलती हैं. ऐसी बहुती-सी चीजे हैं जो विकास के बयार में बह कर कहीं बहुत दूर चली गई है जहाँ से कभी वापस ही नहीं आ सकती है. गांव की इसी स्थिति को बयां कर रहे है मेरी ये रचना. हम उम्मीद करते हैं कि आपको पसंद जरूर आयेगी .
गांव में होकर भी
बचपन वाला गांव ढूढ़ते हैं।
वो पगडण्डी,
वो खेत और खलिहान ढूढ़ते हैं।
गांव में होकर भी
गांव ढूढ़ते हैं।
वह पीपल के पेड़ की
ठंडी छांव
और तालाब का
किनारा ढूढ़ते हैं।
गांव में होकर भी
हम गांव ढूढ़ते हैं।
वो अंगीठी की आग
वो अलाव ढूढ़ते हैं।
नन्ही चिड़िया की चहक,
माटी की महक ढूढ़ते हैं।
गाँव वे होकर भी
हम गांव ढूढ़ते हैं।
वो पनघट, वो पनिहारन,
की अलबेली चाल ढूढ़ते हैं।
गांव में होकर भी
हम गांव ढूढ़ते हैं
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