ममता Vs मोदी: क्या बंगाल की मिट्टी फिर पलटेगी एग्जिट पोल्स की बाजी?

पश्चिम बंगाल.....एक ऐसा राज्य जहाँ की मिट्टी में संगीत भी है और बारूद की महक भी। यहाँ चुनाव सिर्फ सरकार चुनने का जरिया नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और वैचारिक युद्ध होता है। आज बंगाल अपनी नियति लिखने की दहलीज पर खड़ा है। एक तरफ ममता बनर्जी हैं, अकेली महिला योद्धा, जो हैट्रिक के बाद अब चौकी मारने के इरादे से मैदान में हैं। अगर दीदी जीतीं, तो इतिहास के पन्ने फिर से लिखे जाएंगे। लेकिन दूसरी तरफ दिल्ली का शक्तिपुंज है, जो बंगाल के भगवाकरण के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक चुका है। एग्जिट पोल्स की भविष्यवाणियां आ चुकी हैं, सट्टा बाजार गर्म है और टीवी स्टूडियोज में दलीलों की तलवारें खिंच चुकी हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या ममता बनर्जी एलीट क्लब में शामिल होकर ज्योति बसु के रिकॉर्ड को चुनौती देंगी? या फिर 2021 की तरह इस बार भी एग्जिट पोल के गुब्बारे की हवा निकलेगी? 

दरअसल, पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय जिस मोड़ पर है, उसे ऐतिहासिक कहना भी कम होगा। ममता बनर्जी, जिन्हें उनके समर्थक प्यार से दीदी कहते हैं, सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने की लड़ाई नहीं लड़ रही हैं, बल्कि वे भारतीय लोकतंत्र के उस शिखर की ओर बढ़ रही हैं जहाँ बहुत कम राजनेता पहुँच पाए हैं। अगर 2026 के इन संभावित नतीजों में तृणमूल कांग्रेस का परचम लहराता है, तो ममता बनर्जी लगातार चार बार यानि 2011, 2016, 2021 और 2026 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता संभालने वाली देश की पहली महिला मुख्यमंत्री बन जाएंगी। अक्सर लोग उनकी तुलना मायावती से करते हैं, लेकिन यहाँ एक बड़ा पेंच है। मायावती भले ही चार बार मुख्यमंत्री रहीं, लेकिन उनका कार्यकाल टुकड़ों में रहा और कभी भी उन्होंने लगातार चार बार पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं चलाई। ऐसे में ममता अगर जीतती हैं, तो वे उस एलीट क्लब का हिस्सा बनेंगी जिसमें पवन कुमार चामलिंग, नवीन पटनायक और ज्योति बसु जैसे दिग्गजों का नाम दर्ज है। वहीं जब हम दो दशकों के अटूट शासन की बात करते हैं, तो कुछ चेहरे जेहन में कौंध जाते हैं। जैसे...

नरेंद्र मोदी: मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में उनका 24 वर्षों का अटूट सफर उन्हें इस सूची में सबसे ऊपर रखता है।
पवन कुमार चामलिंग: सिक्किम के इस नेता ने लगातार 24 साल से अधिक समय तक राज किया, जो एक रिकॉर्ड है।
नवीन पटनायक: ओडिशा के मिस्टर क्लीन जिन्होंने 24 साल तक बिना किसी शोर-शराबे के शासन किया।
ज्योति बसु: बंगाल के भीष्म पितामह जिन्होंने 23 साल तक वामपंथ का किला सुरक्षित रखा।
गेगोंग अपांग और माणिक सरकार: अरुणाचल और त्रिपुरा के इन नेताओं ने भी 20 साल से ज्यादा समय तक शासन किया।

ऐसे में अब ममता बनर्जी भी इसी 20 साल के जादुई आंकड़े को छूने के करीब हैं। उनके लिए यह चुनाव महज एक राजनीतिक जंग नहीं, बल्कि उनके जीवन की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। वहीं जैसे ही दूसरे चरण का मतदान खत्म हुआ, एग्जिट पोल्स की बाढ़ आ गई। पी-मार्क जैसे कई सर्वे कह रहे हैं कि इस बार बीजेपी 150-175 सीटें लाकर बंगाल में कमल खिला सकती है और टीएमसी 120-130 के बीच सिमट सकती है। सट्टा बाजार भी बीजेपी की जीत पर दांव लगा रहा है।
लेकिन, तृणमूल कांग्रेस ने इन आंकड़ों को सिरे से खारिज कर दिया है। ममता बनर्जी ने इसे वास्तविकता से कोसों दूर बताया है। डेरेक ओ’ब्रायन ने इसे काल्पनिक अटकलबाजी कहा, तो महुआ मोइत्रा ने याद दिलाया कि सर्वे अक्सर गलत साबित होते हैं। टीएमसी की उम्मीदवार शशि पांजा का तो दावा है कि पार्टी 235 से अधिक सीटें लाएगी और बीजेपी 50 के नीचे सिमट जाएगी। 

पार्टी को अपने ग्राउंड फीडबैक और महिला वोटर्स पर अटूट भरोसा है। दरअसल, एग्जिट पोल्स पर टीएमसी के गुस्से की एक बड़ी वजह 2021 का चुनाव है। उस वक्त भी टीवी चैनलों पर अबकी बार 200 पार का शोर था। सर्वे कह रहे थे कि बंगाल में बदलाव की लहर है। लेकिन जब ईवीएम खुली, तो नतीजों ने सबको चौंका दिया। ममता बनर्जी ने प्रचंड बहुमत के साथ वापसी की और बीजेपी के बड़े-बड़े दावे धरे के धरे रह गए। ग्रामीण वोटिंग पैटर्न और खामोश महिला वोटर्स ने सारा गणित बिगाड़ दिया था। इस बार भी 92.47% की भारी वोटिंग हुई है, जो इशारा कर रही है कि जनता के मन में कुछ बहुत बड़ा चल रहा है।

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या बंगाल एक बार फिर ममता बनर्जी के खेला होबे का गवाह बनेगा? या फिर इस बार अमित शाह और जेपी नड्डा की रणनीति दीदी के किले में सेंध लगा देगी? एग्जिट पोल्स की भविष्यवाणियां अपनी जगह हैं, लेकिन बंगाल की जनता का मिजाज समझना हमेशा से टेढ़ी खीर रहा है। यहाँ की जनता कब लहर बन जाए और कब सुनामी, कोई नहीं जानता। 92 प्रतिशत से ज्यादा मतदान चीख-चीख कर कह रहा है कि बंगाल की जनता ने अपना फैसला ले लिया है। अब बस इंतजार है उस आधिकारिक ऐलान का, जो यह तय करेगा कि क्या ममता बनर्जी भारतीय राजनीति की अजेय महिला बनेंगी या बंगाल की सत्ता के गलियारों में कोई नया चेहरा दस्तक देगा। दिल थाम कर बैठिए, क्योंकि बंगाल की इस महा-कहानी का क्लाइमेक्स अभी बाकी है!

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