फर्रुखाबाद में 147 वोटों से हारी थी BJP! 2027 में कौन मारेगा बाजी?
उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां चुनावी नतीजे कभी भी चौंका सकते हैं। कहीं बड़े-बड़े दिग्गजों की किस्मत पलट जाती है, तो कहीं कुछ सौ वोटों का अंतर पूरे चुनाव की कहानी बदल देता है। फर्रुखाबाद विधानसभा सीट भी ऐसी ही दिलचस्प सीटों में शामिल है। जी हां, फर्रुखाबाद की चुनावी कहानी पर नजर डालिए तो साल 2012 का मुकाबला किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं था। यहां निर्दलीय उम्मीदवार विजय सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के मेजर सुनील दत्त द्विवेदी को महज 147 वोटों से शिकस्त दे दी थी। सोचिए, हजारों वोटों की बात छोड़िए, जीत और हार का फैसला सिर्फ 147 वोटों से हो गया! यह नतीजा बताता है कि चुनाव में एक-एक वोट की कितनी बड़ी ताकत होती है।
आज हम आपको बताएंगे फर्रुखाबाद विधानसभा सीट का पूरा चुनावी इतिहास, 2012, 2017 और 2022 के नतीजे, जीत-हार का अंतर और वे स्थानीय मुद्दे, जिन पर आने वाले चुनाव में मतदाताओं का फैसला निर्भर कर सकता है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि फर्रुखाबाद विधानसभा सीट और फर्रुखाबाद लोकसभा सीट दोनों अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र हैं। कई बार इनके नाम एक जैसे होने के कारण लोग भ्रमित हो जाते हैं, लेकिन दोनों का चुनाव अलग होता है।
फर्रुखाबाद विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की विधानसभा सीट संख्या 194 है। यह सामान्य यानी अनारक्षित सीट है और फर्रुखाबाद लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है। इस विधानसभा क्षेत्र में फर्रुखाबाद और फतेहगढ़ जैसे शहरी इलाके और आसपास के क्षेत्र शामिल हैं। इसलिए यहां चुनावी मुकाबला सिर्फ राजनीतिक दलों के नाम पर नहीं होता। अब सवाल है कि पिछले तीन विधानसभा चुनावों में फर्रुखाबाद की जनता ने किसे चुना और हर चुनाव में जीत का अंतर क्या रहा? आइए, साल-दर-साल पूरी कहानी समझते हैं।
साल 2012 का विधानसभा चुनाव फर्रुखाबाद की सियासत का सबसे दिलचस्प मुकाबला माना जा सकता है। इस चुनाव में किसी बड़े राजनीतिक दल के उम्मीदवार के बजाय निर्दलीय प्रत्याशी विजय सिंह ने बाजी मार ली। विजय सिंह को कुल 33 हजार 5 वोट मिले। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार मेजर सुनील दत्त द्विवेदी को 32 हजार 858 वोट हासिल हुए।
दोनों उम्मीदवारों के बीच मुकाबला इतना कड़ा था कि नतीजा आने तक जीत और हार का अंतर बेहद छोटा रहा। आखिरकार विजय सिंह ने मेजर सुनील दत्त द्विवेदी को सिर्फ 147 वोटों से हरा दिया। जी हां, सिर्फ 147 वोट! न हजारों की बढ़त और न ही कोई बहुत बड़ा अंतर। यह ऐसा मुकाबला था, जहां कुछ वोटों का इधर से उधर होना चुनाव का पूरा नतीजा बदल सकता था। इस चुनाव ने एक अहम बात साबित की किसी सीट पर सिर्फ पार्टी का नाम ही सब कुछ नहीं होता। उम्मीदवार की अपनी पकड़, स्थानीय समीकरण और मतदाताओं का रुझान भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। विजय सिंह की जीत ने यह भी दिखाया कि निर्दलीय उम्मीदवार होने के बावजूद अगर मतदाताओं का समर्थन मिल जाए, तो बड़े राजनीतिक दलों को भी कड़ी चुनौती दी जा सकती है। लेकिन राजनीति में एक चुनाव की जीत अगले चुनाव की गारंटी नहीं होती। 2012 में बेहद करीबी मुकाबला जीतने वाली फर्रुखाबाद सीट पर पांच साल बाद ऐसा बदलाव आया कि बीजेपी ने बड़े अंतर से जीत दर्ज कर ली।
अब आते हैं साल 2017 पर। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह चुनाव कई मायनों में अहम रहा और फर्रुखाबाद विधानसभा सीट पर भी बड़ा बदलाव देखने को मिला। 2012 में महज 147 वोटों से हारने वाले बीजेपी उम्मीदवार मेजर सुनील दत्त द्विवेदी ने इस बार शानदार वापसी की। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद उमर खान को बड़े अंतर से हराकर विधानसभा में अपनी जगह बनाई। मेजर सुनील दत्त द्विवेदी को 93 हजार 626 वोट मिले, जबकि बीएसपी के मोहम्मद उमर खान को 48 हजार 199 वोट हासिल हुए। इस तरह बीजेपी उम्मीदवार ने 45 हजार 427 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। अब जरा दोनों चुनावों का अंतर समझिए। साल 2012 में बीजेपी उम्मीदवार की हार सिर्फ 147 वोटों से हुई थी, लेकिन 2017 में उसी उम्मीदवार ने 45 हजार से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की। यानी फर्रुखाबाद में पांच साल के भीतर मुकाबले की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। इस चुनाव में 2012 के विजेता विजय सिंह भी मैदान में थे, लेकिन इस बार उन्हें जीत नहीं मिली। वह 36 हजार 12 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। यह नतीजा बताता है कि फर्रुखाबाद में चुनावी मुकाबला किस तरह बदल सकता है। फिलहाल, 2017 के चुनाव ने इतना जरूर साफ कर दिया कि बीजेपी ने फर्रुखाबाद में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा दी थी। अब देखना था कि क्या पार्टी अगले चुनाव में भी इस बढ़त को कायम रख पाएगी?
साल 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हुए तो फर्रुखाबाद में मुकाबला एक बार फिर दिलचस्प रहा। बीजेपी ने मेजर सुनील दत्त द्विवेदी पर भरोसा जताया और समाजवादी पार्टी ने सुमन शाक्य को मैदान में उतारा। नतीजे आए तो बीजेपी ने एक बार फिर जीत दर्ज कर ली। मेजर सुनील दत्त द्विवेदी को 1 लाख 12 हजार 314 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार सुमन शाक्य को 72 हजार 998 वोट हासिल हुए। इस तरह बीजेपी उम्मीदवार ने सपा प्रत्याशी को 39 हजार 316 वोटों से हरा दिया। यह जीत इसलिए भी अहम थी क्योंकि 2017 में जीत दर्ज करने के बाद बीजेपी ने 2022 में भी अपनी सीट बचाए रखी। लगातार दो विधानसभा चुनावों में जीत के साथ मेजर सुनील दत्त द्विवेदी ने फर्रुखाबाद सीट पर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की। हालांकि, एक बात पर गौर करना भी जरूरी है। साल 2017 में बीजेपी की जीत का अंतर 45 हजार 427 वोट था, जबकि 2022 में यह घटकर 39 हजार 316 वोट रह गया। इसका मतलब यह है कि बीजेपी ने जीत तो बरकरार रखी, लेकिन दोनों चुनावों के बीच जीत का अंतर कम हुआ। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार सुमन शाक्य 72 हजार से ज्यादा वोट हासिल करके दूसरे स्थान पर रहीं।
फर्रुखाबाद विधानसभा सीट की कहानी सिर्फ 2012 से शुरू नहीं होती। इसका राजनीतिक इतिहास इससे काफी पुराना है। चुनावी रिकॉर्ड के मुताबिक, साल 2007 में समाजवादी पार्टी के विजय सिंह ने जीत दर्ज की थी। साल 2002 में निर्दलीय बिजाई सिंह विजयी रहे, जबकि 1996 में भारतीय जनता पार्टी के ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने इस सीट पर जीत हासिल की थी। यानी फर्रुखाबाद की राजनीति में अलग-अलग समय पर राजनीतिक दलों के साथ निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रभाव भी देखने को मिला है। यह इतिहास एक बात की ओर इशारा करता है कि यहां मतदाताओं का फैसला हमेशा एक ही राजनीतिक दल के पक्ष में स्थायी रूप से नहीं रहा। अलग-अलग चुनावों में उम्मीदवारों और राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से परिणाम बदलते रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल आने वाले विधानसभा चुनाव में फर्रुखाबाद का सियासी मुकाबला किस दिशा में जाएगा? बीजेपी के सामने अपनी लगातार दो जीत के रिकॉर्ड को आगे बढ़ाने की चुनौती होगी। पार्टी के लिए जरूरी होगा कि वह अपने पिछले कार्यकाल के काम, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और स्थानीय मुद्दों पर जनता के बीच अपना पक्ष रखे। वहीं, समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती होगी कि वह पिछले चुनाव के प्रदर्शन से आगे बढ़कर बीजेपी को कड़ी टक्कर देने की रणनीति तैयार करे। पार्टी किसे उम्मीदवार बनाती है, स्थानीय स्तर पर कितना मजबूत संगठन खड़ा करती है और जनता के मुद्दों को किस तरह उठाती है इन बातों पर भी नजर रहेगी। इसके अलावा दूसरे राजनीतिक दल और निर्दलीय उम्मीदवार भी मुकाबले को प्रभावित कर सकते हैं। फर्रुखाबाद का 2012 का चुनाव इस बात का उदाहरण है कि निर्दलीय उम्मीदवार भी जीत हासिल कर सकता है, लेकिन 2017 और 2022 के नतीजे बताते हैं कि बीजेपी ने इसके बाद लगातार दो चुनावों में अपनी ताकत दिखाई।
तो यह थी फर्रुखाबाद विधानसभा सीट की चुनावी कहानी जहां 2012 में महज 147 वोटों ने जीत और हार का फैसला किया, 2017 में बीजेपी ने जोरदार वापसी की और 2022 में भी अपनी जीत बरकरार रखी। अब आने वाले विधानसभा चुनाव में फर्रुखाबाद की जनता किन मुद्दों को प्राथमिकता देती है? क्या बीजेपी अपनी जीत का सिलसिला आगे बढ़ा पाएगी? क्या समाजवादी पार्टी मुकाबले को और कड़ा करेगी? और क्या इस बार कोई नया चेहरा या नया राजनीतिक समीकरण चुनावी तस्वीर बदल देगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों की रणनीति और मतदाताओं के रुख से सामने आएंगे।

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