फर्रुखाबाद की भोजपुर सीट का पूरा गणित! BJP मजबूत या सपा करेगी खेला?
उत्तर प्रदेश की राजनीति का पारा हमेशा हाई रहता है, और जब बात हो फर्रुखाबाद जिले की भोजपुर विधानसभा सीट की, तो मुकाबला और भी ज्यादा दिलचस्प हो जाता है! यह वही मैदान है जहां सियासत के बड़े-बड़े धुरंधर आमने-सामने होते हैं। कभी यहां समाजवादी पार्टी की साइकिल सरपट दौड़ती है, तो कभी भारतीय जनता पार्टी का कमल ऐसा खिलता है कि विरोधी पानी मांगते नजर आते हैं। आइए, आपको समझाते हैं कि भोजपुर के इस सियासी रण में आखिर माजरा क्या है!
स्वागत है आपका उस सियासी अखाड़े में जहां हर पांच साल में हवा का रुख बदल जाता है। हम बात कर रहे हैं फर्रुखाबाद की हाई-प्रोफाइल भोजपुर विधानसभा सीट की। यह वो मैदान है जहां विधायक जी की कुर्सी पाने के लिए कांटे की टक्कर होती है। आंकड़ों की बाजीगरी हो या जातियों का चक्रव्यूह, भोजपुर की सियासत में हर पल नया ट्विस्ट आता है। साल 2012 में जिस सीट पर साइकिल ने रफ्तार भरी थी, उसी सीट पर 2017 और 2022 में बीजेपी के नागेंद्र सिंह राठौर ने ऐसा छक्का मारा कि विपक्षी देखते रह गए। लेकिन रुकिए! खेल अभी खत्म नहीं हुआ है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों ने बता दिया है कि मुकाबला अब और भी ज्यादा टक्कर का हो चुका है। यह सीट विधानसभा क्षेत्र संख्या 195 है और फर्रुखाबाद लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है। भोजपुर एक सामान्य श्रेणी की विधानसभा सीट है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इस क्षेत्र में 343 बूथ, 232 मतदान केंद्र और 239 गांव हैं। अगर कुल मतदाताओं और बूथों के आंकड़ों का हिसाब लगाएं, तो इस सीट पर हर एक बूथ पर औसतन करीब 1,166 मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते हैं। यानी हर एक बूथ पर वोटों की एक-एक गिनती प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला करने के लिए बेहद अहम होती है! यानी यह ऐसा विधानसभा क्षेत्र है, जहां ग्रामीण इलाकों के मतदाताओं की भूमिका चुनावी नतीजों को समझने में काफी अहम है। लेकिन भोजपुर की राजनीति को समझने के लिए सबसे पहले इसके चुनावी इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। क्योंकि पिछले तीन विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि यहां मतदाताओं ने समय-समय पर अपना रुख बदला है।
सबसे पहले बात करते हैं साल 2012 के विधानसभा चुनाव की। उस समय भोजपुर सीट पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की थी। सपा के उम्मीदवार जमालुद्दीन सिद्दीकी को 51 हजार 650 वोट मिले थे। उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को 18 हजार 629 वोटों के अंतर से हराया था। उस चुनाव में सपा ने भोजपुर में अपनी राजनीतिक ताकत दिखाई थी। हालांकि, इसके बाद प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला और 2017 के विधानसभा चुनाव में भोजपुर की तस्वीर भी बदल गई।
साल 2017 का विधानसभा चुनाव भोजपुर की सियासत के लिए अहम साबित हुआ। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नागेंद्र सिंह राठौर ने जीत दर्ज की। उन्हें 93 हजार 673 वोट मिले और उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अरशद जमाल सिद्दीकी को 34 हजार 877 वोटों के अंतर से हराया। यह नतीजा बीजेपी के लिए बड़ी कामयाबी था। 2012 में जिस सीट पर समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार जीता था, वहां पांच साल बाद बीजेपी ने मजबूत बढ़त के साथ कब्जा जमा लिया। 2017 के चुनाव ने यह भी दिखाया कि भोजपुर में चुनावी समीकरण स्थायी नहीं हैं। उम्मीदवार, पार्टी का समर्थन, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं का रुख मिलकर नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
अब बात करते हैं 2022 के विधानसभा चुनाव की। इस चुनाव में भी बीजेपी ने नागेंद्र सिंह राठौर पर भरोसा जताया और उन्होंने पार्टी को निराश नहीं किया। नागेंद्र सिंह राठौर को 99 हजार 979 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के अरशद जमाल सिद्दीकी को 72 हजार 521 वोट हासिल हुए। दोनों उम्मीदवारों के बीच जीत का अंतर रहा 27 हजार 458 वोट।
यानी 2022 में भी भोजपुर की जनता ने बीजेपी को बहुमत के साथ आगे रखा और नागेंद्र सिंह राठौर लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के आलोक वर्मा को 15 हजार 714 वोट मिले। एआईएमआईएम के तालिब सिद्दीकी को 3 हजार 919 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की उम्मीदवार अर्चना राठौर को 2 हजार 53 वोट हासिल हुए।
इन आंकड़ों से साफ है कि 2022 में मुख्य मुकाबला बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच रहा। बीजेपी ने करीब 50.68 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि सपा को लगभग 36.76 प्रतिशत वोट मिले। बसपा का वोट प्रतिशत करीब 7.97 रहा।
यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। बीजेपी ने 2022 में जीत तो दर्ज की, लेकिन उसका जीत का अंतर 2017 के मुकाबले कम हुआ। 2017 में जहां जीत का अंतर 34 हजार 877 वोट था, वहीं 2022 में यह घटकर 27 हजार 458 वोट रह गया। हालांकि, केवल जीत का अंतर कम होने से यह तय नहीं किया जा सकता कि मतदाताओं का रुझान पूरी तरह बदल गया है। इसके लिए दूसरे चुनावों के परिणाम और क्षेत्र के मुद्दों को भी समझना होगा।
अब बात उस मुद्दे की, जिसकी चर्चा चुनाव आते ही तेज हो जाती है....भोजपुर का जातीय समीकरण। जी हां क्षेत्रीय चुनावी विश्लेषणों में ठाकुर या राजपूत, मुस्लिम, यादव, लोधी, कुर्मी, शाक्य, ब्राह्मण और अनुसूचित जाति के मतदाताओं को महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा वैश्य और अन्य पिछड़े वर्गों के मतदाताओं की भूमिका पर भी चर्चा होती है।
भोजपुर सीट पर लगभग 4 लाख से ज्यादा मतदाता हैं। यहां जीत-हार तय करने में जातियों का गणित बहुत बड़ा रोल निभाता है।
ठाकुर/राजपूत और अन्य स्वर्ण मतदाता: इस इलाके में मजबूत माने जाते हैं और विधायक जी की पहचान भी इसी से जुड़ी है, लेकिन सियासत कहती है कि वोट एकतरफा कभी नहीं गिरते।
मुस्लिम और यादव वोटर: यह समीकरण समाजवादी पार्टी की ताकत का मुख्य आधार माना जाता है। 2012 की जीत और 2022 में सपा को मिले 72 हजार से ज्यादा वोट इसी मजबूत वोटबैंक की गवाही देते हैं।
लोधी, कुर्मी और शाक्य: यह ओबीसी वर्ग के वोटर चुनावी हवा का रुख पलटने का दम रखते हैं। हालिया चुनावों में इन जातियों का झुकाव खेल को पूरी तरह बदल देता है।
ब्राह्मण, दलित (जाटव) और अन्य जातियां: बसपा और अन्य दलों के पाले में जाने वाले ये वोटर किसी भी पार्टी का खेल बना या बिगाड़ सकते हैं।
कुल मिलाकर भोजपुर का जातीय समीकरण किसी एक समुदाय से तय होता दिखाई नहीं देता। यहां असली सवाल यह है कि कौन-सी पार्टी अपने समर्थक वर्गों के साथ दूसरे समुदायों का भरोसा जीत पाती है और किस उम्मीदवार को स्थानीय स्तर पर ज्यादा स्वीकार्यता मिलती है।
अब सवाल है कि भोजपुर में बीजेपी की ताकत कहां दिखाई देती है? तो आपको बता दें सबसे बड़ा आधार है लगातार दो विधानसभा चुनावों में जीत। साल 2017 में नागेंद्र सिंह राठौर ने 34 हजार 877 वोटों से जीत दर्ज की और 2022 में भी वह 27 हजार 458 वोटों के अंतर से विधायक बने। लगातार दो जीत से यह जरूर पता चलता है कि बीजेपी इस सीट पर मजबूत राजनीतिक स्थिति बना चुकी है। पार्टी के लिए चुनौती होगी कि वह अपने समर्थकों को एकजुट रखे, क्षेत्रीय समस्याओं पर जनता के सामने अपना काम रखे और मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखे।
अब आते हैं उस सवाल पर, जो किसी भी चुनाव में सबसे ज्यादा मायने रखता है....आम जनता के मुद्दे। भोजपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में खेती-किसानी, सिंचाई, आलू की कीमत, फसल का उचित दाम, बिजली की उपलब्धता और छुट्टा पशुओं से होने वाली परेशानी जैसे विषय मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। फर्रुखाबाद और आसपास के इलाकों में आलू की खेती का मुद्दा राजनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है। ऐसे में किसान यह जानना चाहते हैं कि उनकी फसल का उचित दाम कैसे मिलेगा, भंडारण की व्यवस्था कितनी बेहतर होगी और खेती की लागत कम करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।
इसके साथ ही सड़क और परिवहन, गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं, स्कूलों की स्थिति, रोजगार के अवसर और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवाल भी चुनावी चर्चा को प्रभावित कर सकते हैं। लोग यह भी देख सकते हैं कि उनके इलाके में सड़कें कैसी हैं, बिजली कितनी नियमित मिलती है, सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं कैसी हैं और जरूरत के समय स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो पाती हैं या नहीं।
अब सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल कि क्या बीजेपी के नागेंद्र सिंह राठौर लगातार तीसरी बार भोजपुर सीट जीत पाएंगे, या समाजवादी पार्टी वापसी करने में कामयाब होगी? नागेंद्र सिंह राठौर के सामने सबसे बड़ी ताकत उनका लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड है। वहीं, विपक्ष के सामने मौका है कि वह स्थानीय मुद्दों को लेकर जनता के बीच अपनी जगह मजबूत करे और बीजेपी की बढ़त को चुनौती दे। लेकिन चुनावी नतीजे का फैसला केवल पुराने आंकड़ों से नहीं होगा। उम्मीदवार कौन होगा, पार्टियां किस तरह प्रचार करेंगी, स्थानीय संगठन कितना सक्रिय रहेगा, जनता मौजूदा विधायक के कामकाज को कैसे देखती है और चुनाव के समय कौन-से मुद्दे सबसे ज्यादा प्रभावी होंगे, ये सभी बातें अहम रहेंगी।
तो कुल मिलाकर बात यह है कि भोजपुर विधानसभा सीट पर सियासत के तीर हर बार नए निशाने साधते हैं। बीजेपी के पास जहां लगातार दो बार विधानसभा जीतने का कॉन्फिडेंस है, वहीं समाजवादी पार्टी भी अपनी ताकत दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। 2024 के परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि आने वाले दिनों में भोजपुर का दंगल और भी ज्यादा रोमांचक होने वाला है। अब देखना यह है कि अगली बार यहां कमल खिलेगा या फिर साइकिल एक बार फिर रफ्तार पकड़ेगी? जनता किसे अपना मसीहा चुनेगी, ये तो वक्त ही बताएगा! फिलहाल इतना तय है कि भोजपुर की सियासत को समझने के लिए सिर्फ पुराने नतीजे नहीं, बल्कि जनता की मौजूदा समस्याओं और उम्मीदवारों के कामकाज को भी देखना होगा।

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