फरवरी आ गई, संकल्प पीछे छूट गए पर अभी देर नहीं हुई है
हर साल जनवरी अपने साथ नई उम्मीदें लेकर आती है। नए संकल्प, नए लक्ष्य और यह विश्वास कि इस बार जीवन बदल जाएगा। समय पर उठने के वादे, खुद को बेहतर बनाने के इरादे और अनुशासन से भरी योजनाएँ—सब कुछ बहुत अच्छा लगता है।
लेकिन फिर फरवरी आ जाती है। और उसके साथ एक सच्चाई भी सामने आती है। न तो संकल्प पूरे हो पाए, न ही आदतें बदलीं। जीवन फिर से उसी पुरानी राह पर लौटता दिखाई देता है। वही आलस्य, वही टालमटोल और वही “कल से शुरू करेंगे” वाला बहाना।
फरवरी हमें आईना दिखाती है। यह महीना न तो सख़्त होता है, न ही उत्साह से भरा—बस चुपचाप याद दिलाता है कि केवल सोचने से बदलाव नहीं आता। संकल्प बनाना आसान है, लेकिन उन पर टिके रहना ही असली चुनौती है।
फिर भी, फरवरी असफलता का प्रतीक नहीं है। यह एक दूसरा अवसर है। साल अभी लंबा है, और हर दिन अपने आप को थोड़ा बेहतर बनाने का मौका देता है। छोटे कदम, बिना दबाव के, भी बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकते हैं।
भले ही जीवन अभी वैसा ही लग रहा हो जैसा पहले था, लेकिन बदलाव की शुरुआत कभी भी हो सकती है। फरवरी बस इतना कहती है—अभी देर नहीं हुई है।


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