बांस की खेती से सतत आय का सशक्त माध्यम; ‘बीज संवर्धन’ हर घर तक पहुँचे

गडचिरौली : कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन अभिकरण (आत्मा) तथा कृषि विभाग, गडचिरौली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित भव्य ‘कोया कृषि कुंभ 2026’ के तीसरे दिन परिचर्चा एवं परिसंवाद के माध्यम से किसानों को सतत कृषि, बांस की खेती, बीज संवर्धन, प्राकृतिक उर्वरक तथा कृषि पर्यटन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन मार्गदर्शन दिया गया।

इस अवसर पर यह स्पष्ट किया गया कि इस महोत्सव के माध्यम से किसानों को कम लागत, पर्यावरण–अनुकूल और बाजारोन्मुख खेती की ओर प्रेरित करने का शासन का प्रयास है।
बांस की खेती आय का बड़ा और स्थायी अवसर – पाशा पटेल
राज्य कृषि मूल्य आयोग के अध्यक्ष पाशा पटेल ने कहा कि पारंपरिक खेती के विकल्प के रूप में बांस की खेती एक बड़ी और सतत आर्थिक संभावना है। उन्होंने बताया कि बांस की खेती में उत्पादन लागत कम होती है, कम श्रम की आवश्यकता होती है तथा यह विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में आसानी से उगाया जा सकता है।
उन्होंने किसानों से बांस की खेती अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत बांस की खेती के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध है, जिसका लाभ लेकर किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं। वन संपदा और आदिवासी बहुल गडचिरौली जिले के लिए बांस की खेती दीर्घकालीन और सुरक्षित आय का साधन बन सकती है।
जिले में प्रस्तावित बांस से ईंधन निर्माण कारखाने से स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा, इस ओर ध्यान आकर्षित करते हुए उन्होंने बढ़ते कार्बन उत्सर्जन की पृष्ठभूमि में वृक्ष संवर्धन पर जोर दिया। साथ ही समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशीलता से कार्य करने का संदेश उन्होंने उपस्थित अधिकारियों एवं कर्मचारियों को दिया।
‘बीज संवर्धन’ हर घर में होना चाहिए – बीजमाता राहीबाई पोपेरे
इस कार्यक्रम में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित बीजमाता राहीबाई पोपेरे ने स्वदेशी बीजों के संरक्षण और सतत खेती पर प्रभावी मार्गदर्शन किया। उन्होंने जानकारी दी कि वर्तमान में उनके पास 200 से अधिक पारंपरिक बीज किस्मों का संग्रह है, जिनमें से 154 किस्मों का पंजीकरण किया जा चुका है।
उन्होंने कहा, “मैं स्कूल में नहीं पढ़ी, लेकिन प्रकृति की पाठशाला में सीखा है। मैंने ‘जुन से सोन’ (पुराने से नए) बीजों का संरक्षण किया है।”
बीज संवर्धन का विचार हर घर तक पहुँचना चाहिए और प्रत्येक परिवार को इस कार्य में सहभागी बनना चाहिए, ऐसी अपेक्षा उन्होंने व्यक्त की।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि बीज ही किसान की पहचान है। यदि बीज सुरक्षित रहेंगे तो खेती, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ी भी सुरक्षित रहेगी। पारंपरिक बीजों के संरक्षण से पोषण और स्वास्थ्य को मजबूती मिलेगी।
प्राकृतिक उर्वरक और कृषि पर्यटन पर विशेष जोर
दूसरे सत्र में डॉ. संतोष चौहान, संचालक (फार्म प्रयोगशाला, वाशिम) ने खेत में ही प्राकृतिक उर्वरक निर्माण कर उत्पादन लागत कम करने के तरीकों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र एवं केंद्र सरकार के सहयोग से 1140 जैविक आदान संसाधन केंद्रों को मान्यता दी गई है।
उन्होंने कहा कि गडचिरौली जिला रासायनिक उर्वरकों के कम उपयोग वाला क्षेत्र है, इसलिए यहां प्राकृतिक खेती की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।
इसके बाद पांडुरंग तावरे, संचालक (शिवतीर्थ पर्यटन केंद्र, वायगांव) ने कृषि पर्यटन विषय पर मार्गदर्शन करते हुए कहा, “जो उगता है, वह बिकना चाहिए और जो बिकता है, वही उगाया जाना चाहिए।”
उन्होंने बताया कि गडचिरौली जिले में कृषि पर्यटन की बड़ी संभावनाएं हैं, जिससे किसानों के साथ-साथ ग्रामीण युवाओं को भी स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सकता है।
किसानों और विद्यार्थियों की बड़ी भागीदारी
इस कृषि महोत्सव में गडचिरौली जिले सहित आसपास के क्षेत्रों के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के विद्यार्थियों ने विभिन्न स्टॉल्स का भ्रमण कर शासकीय योजनाओं, कृषि विश्वविद्यालयों की तकनीकों तथा विशेषज्ञों के मार्गदर्शन का लाभ लिया। महोत्सव में 1700 से अधिक किसान, सैकड़ों विद्यार्थी तथा विभिन्न शासकीय विभागों एवं संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी रही।
8 फरवरी को ‘नाचणी का शिरा’ – विश्वविक्रम का ऐतिहासिक क्षण
दिनांक 08 फरवरी 2026 को मोटे अनाजों के महत्व को रेखांकित करने तथा विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली नाचणी फसल को वैश्विक पहचान दिलाने के उद्देश्य से प्रसिद्ध शेफ विष्णु मनोहर के हाथों 1111 किलो नाचणी का शिरा तैयार कर विश्वविक्रम स्थापित किया जाएगा।
इस ऐतिहासिक और विश्वविक्रमी क्षण के साक्षी बनने के लिए जिले के सभी किसान भाइयों एवं नागरिकों से रविवार, दि. 08 फरवरी 2026 को बड़ी संख्या में उपस्थित रहने का आह्वान जिला अधीक्षक कृषि अधिकारी प्रीति हिरळकर ने किया।

रिपोर्टर : चंद्रशेखर पुलगम 

 

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