जिमलगट्टा वन परिक्षेत्र में आग का कहर;उपायों के बावजूद नहीं थम रही घटनाए

गडचिरोली : हर वर्ष फरवरी से जून के बीच जंगलों में लगने वाली आग से भारी मात्रा में वन संपदा का नुकसान होता है, लेकिन इस वर्ष जिमलगट्टा वन परिक्षेत्र में आग का प्रकोप बेहद भयावह रूप में सामने आया है। हालात ऐसे हैं कि कीमती वन संपदा बड़ी मात्रा में जलकर राख हो रही है और पूरे क्षेत्र में चिंता का माहौल बना हुआ है।

वन विभाग की ओर से आग पर नियंत्रण के लिए कई उपाय किए जाने का दावा किया जाता है। इनमें नियंत्रण कक्ष की स्थापना, नोडल अधिकारियों की नियुक्ति, टोल-फ्री नंबर की व्यवस्था, ‘वनवा मित्र’ जैसी पहल और संवेदनशील क्षेत्रों में कर्मचारियों की तैनाती जैसे कदम शामिल हैं। बावजूद इसके, लगातार सामने आ रही घटनाओं ने इन उपायों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि ये व्यवस्थाएं कहीं न कहीं कागजों तक ही सीमित रह गई हैं।
जिमलगट्टा वन परिक्षेत्र में बार-बार लग रही आग के कारण स्थिति दिन-ब-दिन गंभीर होती जा रही है। इन घटनाओं में लाखों रुपये की वन संपदा नष्ट हो रही है। इसके साथ ही जंगलों में रहने वाले वन्यजीवों का जीवन भी खतरे में पड़ गया है। हजारों पक्षी, जीव-जंतु और जैव विविधता पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जो पर्यावरण के लिए चिंताजनक संकेत है।
गौरतलब है कि गड़चिरोली जिला राज्य में जंगलों में लगने वाली आग की घटनाओं में अग्रणी बनता दिखाई दे रहा है। इस पृष्ठभूमि में वन संरक्षण की जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इसके विपरीत नजर आ रही है।
इस संबंध में जिमलगट्टा के वन परिक्षेत्र अधिकारी का कहना है कि आग पर नियंत्रण के लिए विभाग लगातार प्रयास कर रहा है। हालांकि, लगातार हो रही घटनाएं इन दावों पर सवाल खड़े करती हैं और यह संकेत देती हैं कि मौजूदा उपाय पर्याप्त साबित नहीं हो रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इतनी योजनाओं और व्यवस्थाओं के बावजूद आग पर नियंत्रण क्यों नहीं पाया जा रहा है? क्या इसके पीछे मानवीय लापरवाही, जानबूझकर लगाई जा रही आग या फिर प्रशासनिक कमियां जिम्मेदार हैं—यह जांच का विषय है।
स्पष्ट है कि वन संपदा की सुरक्षा के लिए केवल योजनाएं बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका प्रभावी और सख्ती से क्रियान्वयन भी जरूरी है। अन्यथा, आने वाले समय में जिमलगट्टा का हरा-भरा वन क्षेत्र पूरी तरह नष्ट होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

रिपोर्टर : संजय यमसलवार 

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