जल,जंगल और जनभागीदारी : पर्यावरण संरक्षण का गढ़चिरौली मॉडल

गढ़चिरौली : महाराष्ट्र के सर्वाधिक वनाच्छादित जिलों में शामिल गढ़चिरौली ने पर्यावरण संरक्षण और जनभागीदारी का एक अनूठा मॉडल विकसित किया है। राज्य के "फेफड़े" के रूप में पहचान रखने वाले इस जिले ने सामुदायिक वन अधिकार, ग्रामसभा सशक्तिकरण, वन आधारित अर्थव्यवस्था, जल संरक्षण और हरित विकास के विभिन्न उपक्रमों के माध्यम से सतत विकास की प्रभावी मिसाल प्रस्तुत की है। पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय विकास के बीच संतुलन स्थापित करते हुए गढ़चिरौली आज पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत बन रहा है।

मुख्यमंत्री Devendra Fadnavis ने विभिन्न अवसरों पर स्पष्ट किया है कि "जल, जंगल और जमीन को सुरक्षित रखते हुए ही विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।" इसी दृष्टिकोण के तहत जिले में पर्यावरण संरक्षण और विकास को परस्पर पूरक मानते हुए अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं। हरित क्षेत्र को और समृद्ध बनाने के लिए जनसहभागिता से एक करोड़ वृक्षारोपण अभियान भी चलाया जा रहा है।

वन अधिकारों से पर्यावरण संरक्षण को नई दिशा

वन अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के कारण गढ़चिरौली ने राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान बनाई है। जिले में 33,308 व्यक्तिगत वन अधिकार दावों को मंजूरी प्रदान कर 39,338.32 हेक्टेयर भूमि लाभार्थियों को उपलब्ध कराई गई है।

इसके अलावा 1,458 सामुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) स्वीकृत किए गए हैं, जिनके अंतर्गत 5 लाख 21 हजार 580 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र के संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार ग्रामसभाओं को सौंपा गया है।

इन अधिकारों के माध्यम से ग्रामसभाएं जंगलों के संरक्षण, पुनर्जीवन, जैव विविधता संवर्धन, वन्यजीव सुरक्षा तथा प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वन अधिकार कानून की धारा-5 के अंतर्गत ग्रामसभाओं को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंपी गई है।

ग्रामसभा सशक्तिकरण को राज्यस्तरीय सम्मान

सामुदायिक वन अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन और ग्रामसभा सशक्तिकरण के कारण गढ़चिरौली जिले को पिछले वर्ष राजीव गांधी प्रशासनिक गतिमानता (प्रगति) पुरस्कार में विभागीय स्तर पर तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। सामुदायिक वन संपदा के प्रबंधन, स्थानीय सहभागिता और पर्यावरण संरक्षण के इस मॉडल को राज्यभर में आदर्श माना जा रहा है।

धुआं रहित चूल्हे : पर्यावरण और स्वास्थ्य का संगम

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पहल पर धानोरा और एटापल्ली तहसीलों में 20 हजार धुआं रहित चूल्हों का वितरण किया गया है। इस पहल से ईंधन लकड़ी पर निर्भरता कम हुई है, जिससे जंगलों पर दबाव घटा है। साथ ही कार्बन उत्सर्जन में कमी आने से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को नियंत्रित करने में भी सहायता मिल रही है।

इस पहल की सफलता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने राज्य के अन्य आदिवासी बहुल जिलों में भी 10 लाख धुआं रहित चूल्हों के वितरण के निर्देश दिए हैं।

जल संरक्षण से जलवायु परिवर्तन का मुकाबला

जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए जिले में जल संरक्षण को विशेष प्राथमिकता दी जा रही है। गादमुक्त-गादयुक्त अभियान, नाला गहरीकरण, जलस्रोत पुनर्जीवन, जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण तथा वृक्ष संवर्धन कार्यक्रमों के माध्यम से भूजल स्तर सुधारने, कृषि उत्पादकता बढ़ाने और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है।

पर्यावरण अनुकूल पर्यटन की नई पहचान

गढ़चिरौली प्राकृतिक पर्यटन स्थलों की दृष्टि से भी समृद्ध है। यहां के प्रमुख आकर्षणों में Tipagad, Binagunda Waterfall, Bhamragad, Somnur Triveni Sangam, Kamalapur Elephant Camp, Alapalli Forest Area, Chaprala Wildlife Sanctuary, गाबरा पहाड़ियां तथा वडधम फॉसिल पार्क शामिल हैं। ये स्थल पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन विकास के संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

प्रकृति से जुड़ी आदिवासी संस्कृति

गढ़चिरौली के आदिवासी समाज का प्रकृति से गहरा और आत्मीय संबंध है। जंगल, जलस्रोत, पर्वत और जैव विविधता के प्रति सम्मान उनकी संस्कृति और परंपराओं का अभिन्न हिस्सा है। प्रकृति संरक्षण यहां केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा है। यही कारण है कि पर्यावरण संरक्षण के मूल्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रहे हैं।

सतत विकास का प्रेरणादायी मॉडल

सामुदायिक एवं व्यक्तिगत वन अधिकार, ग्रामसभा सशक्तिकरण, एक करोड़ वृक्षारोपण अभियान, धुआं रहित चूल्हे, जल संरक्षण कार्यक्रम, पर्यावरण अनुकूल पर्यटन और आदिवासी समाज की प्रकृति-केंद्रित जीवनशैली—इन सभी प्रयासों ने गढ़चिरौली को पर्यावरण संरक्षण और जनसहभागिता आधारित सतत विकास का एक सफल मॉडल बना दिया है।

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर गढ़चिरौली का यह मॉडल यह संदेश देता है कि यदि स्थानीय समुदायों को संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन में सहभागी बनाया जाए, तो पर्यावरण संरक्षण और विकास दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सकता है।

रिपोर्टर : संजय यमसलवार 

 

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.