वन अधिकार कानून के तहत वन भूमि के दावों की जांच प्रक्रिया को लेकर वन विभाग ने किया नागरिकों को जागरूक
गडचिरोली : वन भूमि पर वन अधिकार कानून के तहत दावों की जांच एवं पात्रता निर्धारित करने की प्रक्रिया को लेकर नागरिकों में फैल रहे कथित भ्रम को दूर करने के लिए वन विभाग, आसरेली वनपरिक्षेत्र की ओर से स्पष्टीकरण जारी किया गया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में चल रही प्रक्रिया का उद्देश्य किसी भी नागरिक को नई वन भूमि आवंटित करना या जमीन के नए पट्टे बांटना नहीं है, बल्कि निर्धारित कानून एवं नियमों के अनुसार पहले से किए गए दावों की जांच करना है।
वन विभाग द्वारा जारी प्रेस नोट के अनुसार, आसरेली वनपरिक्षेत्र के अंतर्गत गोलागुडम माल क्षेत्र के सर्वे नंबर 493, 580 और 316 में वन भूमि से संबंधित दावों की जांच प्रक्रिया शुरू है। वन अधिकार कानून के तहत अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पारंपरिक वन निवासी नागरिकों द्वारा किए गए दावों की पात्रता की जांच निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार की जा रही है।
नई जमीन या पट्टे बांटने की बात गलत
वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि कुछ नागरिकों और ग्रामीणों के बीच यह गलतफहमी फैल रही है कि वन विभाग द्वारा नई जमीन का आवंटन किया जा रहा है अथवा जमीन के पट्टे वितरित किए जा रहे हैं। विभाग ने इस तरह की चर्चाओं को गलत बताते हुए कहा है कि वन विभाग द्वारा किसी भी प्रकार की नई वन भूमि का आवंटन या नए पट्टे देने की प्रक्रिया नहीं चल रही है।
वर्तमान में जो प्रक्रिया शुरू है, वह उन पात्र आदिवासी एवं अन्य पारंपरिक वन निवासियों के दावों से संबंधित है, जिन्होंने 13 दिसंबर 2005 से पूर्व से वन भूमि पर कब्जा/अधिकार होने का दावा किया है। ऐसे दावों की जांच और पात्रता का निर्धारण वन अधिकार कानून में निर्धारित प्रावधानों के अनुसार किया जाता है।
अतिक्रमण से जुड़े दावों की भी होगी जांच
प्रेस नोट में बताया गया है कि जिन नागरिकों ने कानून के अनुसार वन भूमि पर अपने अधिकार का दावा प्रस्तुत किया है, उनके दावों की जांच निर्धारित प्रक्रिया के तहत की जा रही है। जांच के दौरान अतिक्रमण धारकों का मौका पंचनामा, नमूना-3 तथा जी.पी.एस. नक्शे जैसी आवश्यक जानकारी संबंधित स्तर पर उपलब्ध कराई जाएगी।
इसके बाद दावों की जांच एवं प्रक्रिया अध्यक्ष, उपविभागीय स्तरीय वनहक्क समिति तथा उपविभागीय अधिकारी, अहेरी के निर्देशानुसार आगे बढ़ाई जा रही है। अर्थात दावों को केवल वन विभाग के स्तर पर मनमाने ढंग से मंजूर नहीं किया जाता, बल्कि निर्धारित समिति एवं प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से निर्णय लिया जाता है।
13 दिसंबर 2005 के बाद के अतिक्रमण को मान्यता नहीं
वन विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि 13 दिसंबर 2005 के बाद किए गए नए अतिक्रमण को वन अधिकार कानून, 2006 के तहत मान्यता नहीं दी जाती। वन अधिकार कानून के अंतर्गत दावों पर निर्णय लेने का अधिकार संबंधित जिला स्तरीय समिति (DLC) के पास है, जिसकी अध्यक्षता जिलाधिकारी करते हैं।
वन विभाग की भूमिका मुख्य रूप से दावों की तकनीकी जांच, स्थल निरीक्षण एवं माप-जोख आदि में सहयोग करने तक सीमित है। इसलिए नागरिकों से अपील की गई है कि वे वन अधिकार कानून के तहत चल रही प्रक्रिया को लेकर किसी भी प्रकार की अफवाह पर विश्वास न करें।
जमीन दिलाने के नाम पर पैसे मांगने वालों से सावधान
वन विभाग ने नागरिकों को विशेष रूप से सावधान करते हुए कहा है कि “वन जमीन का वाटप शुरू है” जैसी अफवाहों पर भरोसा न करें। सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से फैलने वाली अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर किसी अनजान या मध्यस्थ व्यक्ति को पैसे देकर जमीन का पट्टा हासिल करने का प्रयास न करें।
विभाग ने चेतावनी दी है कि यदि कोई व्यक्ति वन भूमि का पट्टा दिलाने के नाम पर आर्थिक लाभ लेने का प्रयास करता है, तो नागरिक ऐसे लोगों के झांसे में न आएं। इसी तरह वन भूमि प्राप्त होने की उम्मीद में पेड़ों को काटना, जंगल की सफाई करना अथवा वन भूमि पर कब्जा करने का प्रयास करना गंभीर अपराध की श्रेणी में आ सकता है और ऐसे मामलों में भारतीय वन अधिनियम, 1927 के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
अफवाहों से बचने और अधिकृत जानकारी लेने की अपील
वन विभाग ने नागरिकों और ग्रामस्थों से अपील की है कि वन अधिकार कानून से संबंधित किसी भी जानकारी के लिए केवल अधिकृत शासकीय सूचना एवं संबंधित अधिकारियों पर भरोसा करें। सोशल मीडिया अथवा अन्य माध्यमों से मिलने वाली अपुष्ट खबरों के कारण भ्रमित न हों।
विभाग ने नागरिकों से कहा है कि वन अधिकार कानून की वास्तविक स्थिति जानने के लिए संबंधित वनपरिक्षेत्र कार्यालय अथवा अधिकृत अधिकारियों से संपर्क करें। साथ ही ग्रामस्थों से वन विभाग की प्रक्रिया में सहयोग करने तथा वन संपदा की सुरक्षा बनाए रखने की अपील की गई है।
वन विभाग का स्पष्ट संदेश है कि वन अधिकार कानून के तहत चल रही प्रक्रिया पात्र दावेदारों के दावों की नियमानुसार जांच के लिए है, न कि नई वन भूमि के वितरण अथवा नए पट्टे जारी करने के लिए।
रिपोर्टर : चंद्रशेखर पुलगम
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