शहर में वनभूमि पर अतिक्रमण; वन विभाग नींद में है या नींद का बहाना कर रहा है
गद्चिरौली - अहेरी शहर के मध्यवर्ती क्षेत्र में वन विभाग की जमीन पर कथित रूप से अतिक्रमण कर वहां लेआउट विकसित करने की गतिविधियां शुरू होने की चर्चा है। इस मामले में पिछले कई वर्षों से शिकायतें किए जाने के बावजूद प्रशासन की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं किए जाने से नागरिकों में नाराजगी व्यक्त की जा रही है। गरीब नागरिकों द्वारा किए गए छोटे-छोटे अतिक्रमणों पर तत्काल कार्रवाई करने वाला वन विभाग इस मामले में आखिर चुप क्यों है? वन विभाग नींद में है या नींद का बहाना कर रहा है? यह सवाल अब नागरिकों की ओर से उठाया जा रहा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित व्यक्ति का अहेरी शहर के अन्य स्थानों पर भी अतिक्रमण होने की चर्चा है। बताया जाता है कि संबंधित व्यक्ति कुछ वर्ष पहले बाहर से आकर अहेरी में रहने लगा था। उनके परिवार के सदस्यों तथा रिश्तेदारों द्वारा भी शहर के अन्य स्थानों पर अतिक्रमण किए जाने की चर्चा है। क्या एक ही परिवार ने अतिक्रमण का गोरखधंधा ही शुरू कर दिया है? ऐसा सवाल नागरिकों की ओर से उठाया जा रहा है।
चलता-फिरता रास्ता बंद कर नागरिकों की आवाजाही पर रोक?
बताया जाता है कि संबंधित व्यक्ति ने वनभूमि पर अतिक्रमण कर कुछ वर्ष पहले नागरिकों के आवागमन के लिए इस्तेमाल होने वाला रास्ता बंद कर दिया और वहां से आने-जाने पर रोक लगा दी। इसके विरोध में क्षेत्र के स्थानीय नागरिकों ने स्थानीय प्रशासन से शिकायत भी की थी। इसके बाद स्थानीय प्रशासन द्वारा निषेध आदेश जारी किए जाने के बावजूद उसकी अमलदारी नहीं हुई अथवा संबंधित लोगों ने आदेश की अवहेलना की, ऐसा आरोप है। यदि प्रशासन के आदेशों की भी कोई परवाह नहीं करता, तो इसे दबंगई समझा जाए या पैसों का घमंड? ऐसा सवाल नागरिकों द्वारा उठाया जा रहा है।
न्यायालय के आदेश के बाद भी जगह खाली क्यों नहीं?
उक्त अतिक्रमण से संबंधित मामले में अतिक्रमणकर्ता जिला न्यायालय में मुकदमा हार चुका है, ऐसा बताया जाता है। हालांकि, न्यायालय के आदेश के बाद भी संबंधित जगह को खाली नहीं कराया गया है, ऐसा आरोप है। इससे भी गंभीर बात यह है कि वन विभाग ने भी संबंधित जगह को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए हैं, ऐसी चर्चा है। यदि न्यायालय के आदेश का पालन ही नहीं हो रहा है, तो प्रशासन आखिर किसके दबाव में है? गरीबों के अतिक्रमण पर तत्काल कार्रवाई करने वाली व्यवस्था यहां निष्क्रिय क्यों है? क्या पैसों के सामने व्यवस्था हार गई है? नागरिकों की ओर से ऐसा तीखा सवाल किया जा रहा है। इस मामले में किसी प्रकार का आर्थिक लेन-देन हुआ है क्या, ऐसा संदेह व्यक्त किया जा रहा है। हालांकि, इसकी सच्चाई स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
अतिक्रमित जमीन पर लेआउट डालने का प्रयास?
उक्त अतिक्रमित जमीन पर लेआउट विकसित किए जाने की चर्चा है। इस काम में भूमि अभिलेख कार्यालय के एक कर्मचारी द्वारा मदद किए जाने की भी बात कही जा रही है। संबंधित अतिक्रमण को नियमों के अनुरूप दिखाने अथवा लेआउट के काम में मदद करने में क्या इस कर्मचारी की भूमिका रही है? यह व्यक्ति आखिर कौन है? इसकी जांच किए जाने की मांग हो रही है। इतना ही नहीं, संबंधित कर्मचारी की इस लेआउट में हिस्सेदारी होने की भी क्षेत्र में चर्चा है। इसलिए संबंधित व्यक्ति, संबंधित कर्मचारी तथा उनके परिवार के सदस्यों के आर्थिक लेन-देन, जमीन संबंधी व्यवहार, दस्तावेज तथा संभावित हितसंबंधों की जांच की जाए, ऐसी मांग जोर पकड़ रही है।
दस्तावेजों में फेरबदल अथवा छेड़छाड़ हुई है क्या?
भूमि अभिलेख कार्यालय के कर्मचारी को साथ लेकर जमीन के दस्तावेजों में फेरबदल किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, ऐसी चर्चा है। इसलिए उक्त जमीन के पुराने और नए अभिलेख, माप-नक्शे, फेरफार (म्यूटेशन) रिकॉर्ड, स्वामित्व अधिकार से संबंधित दस्तावेज तथा लेआउट से संबंधित सभी दस्तावेजों की गहन जांच की जाए, ऐसी मांग नागरिकों द्वारा की जा रही है।
सैकड़ों ब्रास पत्थर, मुरुम और रेत की भी जांच करें
उक्त लेआउट में बड़ी मात्रा में, सैकड़ों ब्रास मुरुम डाले जाने की बात प्रथम दृष्टया दिखाई देती है। यह पत्थर और मुरुम कहां से लाया गया? इसकी रॉयल्टी जमा की गई है या नहीं? परिवहन के लिए आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं? इसकी राजस्व विभाग द्वारा जांच की जाए, ऐसी मांग की जा रही है। इसी प्रकार लेआउट के विकास के लिए इस्तेमाल किए जा रहे रेत के भंडार की भी जांच की जाए। रेत कहां से लाई गई, उसकी रॉयल्टी जमा की गई है या नहीं तथा परिवहन संबंधी नियमों का पालन किया गया या नहीं, इसकी भी जांच की जाए, ऐसी मांग नागरिकों द्वारा की जा रही है।
सागौन के पेड़ों की कटाई को लेकर भी सवालिया निशान?
संबंधित अतिक्रमित क्षेत्र तथा कथित निजी स्वामित्व वाली जमीन पर मौजूद सागौन के पेड़ों में से कुछ पेड़ों को अनुमति लेकर, जबकि कुछ पेड़ों को बिना अनुमति काटे जाने की चर्चा है। बताया जाता है कि वृक्ष कटाई के लिए संबंधित व्यक्ति ने अहेरी नगर पंचायत में आवेदन किया था। लेकिन यदि संबंधित जमीन वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आती है, तो वृक्ष कटाई की अनुमति किस विभाग से लेना आवश्यक था? नगर पंचायत में आवेदन क्यों किया गया? इस पूरी प्रक्रिया की जांच होना आवश्यक है।
पुराने विवादों और धमकाने के आरोपों की भी जांच करें
बताया जाता है कि संबंधित व्यक्ति ने इससे पहले भी दबंगई के साथ कई विवाद किए हैं। साथ ही, उक्त अतिक्रमण के खिलाफ शिकायत किए जाने से नाराज होकर कुछ वर्ष पहले अतिक्रमणकर्ता के बेटे ने अहेरी के मुख्य चौक में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के साथ मारपीट की थी, ऐसी भी चर्चा है। यदि यह आरोप सत्य है, तो संबंधित मामले की स्वतंत्र जांच होना आवश्यक है। इसी प्रकार संबंधित ठेकेदार अथवा अतिक्रमणकर्ता की ओर से शिकायतकर्ता के खिलाफ झूठे मामले दर्ज कराने की धमकी दिए जाने की भी चर्चा है। इन आरोपों की भी पुलिस प्रशासन द्वारा निष्पक्ष जांच की जाए, ऐसी मांग की जा रही है। शिकायतकर्ता के खिलाफ मानहानि का दावा इसी प्रकार के एक कथित अतिक्रमण के खिलाफ शिकायत किए जाने के कारण संबंधित लेआउट धारक द्वारा गडचिरोली न्यायालय में शिकायतकर्ता के खिलाफ मानहानि का दावा दाखिल किए जाने की भी जानकारी सामने आ रही है। कानूनी रास्ते का इस्तेमाल करना हर व्यक्ति का अधिकार है। लेकिन अतिक्रमण की शिकायत के बाद शिकायतकर्ता पर दबाव बनाने के लिए कानूनी कार्रवाई का इस्तेमाल किया गया है क्या, इसकी वस्तुनिष्ठ पृष्ठभूमि की भी जांच करना आवश्यक है।
क्षेत्र के नागरिकों और वरिष्ठ नागरिकों ने मौका जांच की मांग की
इस मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए लेआउट के आसपास रहने वाले नागरिकों, तत्कालीन अहेरी ग्राम पंचायत में शिकायत करने वाले नागरिकों तथा संबंधित वार्ड के वरिष्ठ नागरिकों के बयान लिए जाएं और उनकी भी जांच की जाए, ऐसी मांग की जा रही है। प्रत्यक्ष मौका पंचनामा कर जमीन की पूर्व स्थिति, रास्ता, अतिक्रमण की शुरुआत, निर्माण, मुरुम-रेत का इस्तेमाल तथा लेआउट के काम की वर्तमान स्थिति का रिकॉर्ड तैयार किया जाए, ऐसी मांग नागरिकों द्वारा की जा रही है। उक्त लेआउट के पास पहले शवविच्छेदन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एक कमरेनुमा जगह होने की भी चर्चा है। उस कमरे की जगह, स्वामित्व, उपयोग और वर्तमान स्थिति के संबंध में भी गहन जांच की जाए तो इस मामले की कई महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट हो सकती हैं, ऐसी चर्चा है।
वन विभाग तत्काल पुनः माप-जोख करे
वन विभाग द्वारा उक्त पूरी जमीन की तत्काल पुनः माप-जोख कर वनभूमि की सीमा निश्चित की जाए। वन विभाग, राजस्व विभाग तथा भूमि अभिलेख कार्यालय द्वारा संयुक्त रूप से प्रत्यक्ष निरीक्षण कर आधिकारिक रिपोर्ट तैयार की जाए, ऐसी मांग की जा रही है। उक्त जमीन के स्वामित्व अधिकार को लेकर न्यायालय में मामला लंबित होने की भी जानकारी सामने आ रही है। इसलिए न्यायालयीन मामले से संबंधित दस्तावेज, पूर्व आदेश, जमीन के अभिलेख तथा वास्तविक कब्जे की स्थिति की गहन जांच होना आवश्यक है।
अब तो वन विभाग कुंभकर्णी नींद से जागेगा या नहीं?
पिछले कई वर्षों से शिकायतें किए जाने के बावजूद, न्यायालय का आदेश होने की बात सामने आने के बावजूद और वनभूमि पर कथित अतिक्रमण कर लेआउट विकसित करने का प्रयास किए जाने की चर्चा के बावजूद प्रशासन कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है? गरीब नागरिकों के छोटे-छोटे अतिक्रमणों पर तत्काल कार्रवाई करने वाला वन विभाग इस मामले में ही निष्क्रिय क्यों है? प्रशासन की यह निष्क्रियता आखिर किसके हित में है? क्या अतिक्रमणकर्ता को किसी का संरक्षण प्राप्त है? संबंधित विभाग के कर्मचारी और लेआउट धारक के बीच कोई आर्थिक हितसंबंध है क्या? इन सभी सवालों के जवाब अब निष्पक्ष जांच के माध्यम से ही सामने आना आवश्यक है। वन विभाग द्वारा तत्काल पूरी जमीन की पुनः माप-जोख की जाए, राजस्व विभाग द्वारा मुरुम, पत्थर और रेत की जांच की जाए, भूमि अभिलेख विभाग द्वारा सभी दस्तावेजों की जांच की जाए तथा पुलिस प्रशासन द्वारा धमकी, मारपीट और पुराने विवादों से संबंधित आरोपों की निष्पक्ष जांच की जाए, ऐसी मांग की जा रही है।
अब तो वन विभाग कुंभकर्णी नींद से जागकर कार्रवाई करेगा या फिर शहर के बीचोंबीच कथित वनभूमि पर हुए अतिक्रमण की ओर आंखें मूंदकर देखता रहेगा?
रिपोर्टर - प्रशांत नामनवार
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