​गुड टच-बैड टच पर सामाजिक आंदोलन आवश्यक-सामाजिक कार्यकर्ता राकेश चव्हाण

गढ़चिरौली - कुरखेड़ा.​लैंगिक उत्पीड़न, छेड़छाड़, अपहरण और बच्चों के खिलाफ बढ़ते अपराधों की पृष्ठभूमि में बच्चों को ‘गुड टच-बैड टच’ (अच्छे और बुरे स्पर्श) की जानकारी देना समय की मांग है इसे प्रभावी बनाने के लिए परिवार, समाज और शैक्षणिक संस्थाओं के साथ सरकार को आवश्यक कदम उठाने का आव्हान सामाजिक कार्यकर्त्ता राकेश चौहान ने किया है. हमारी संस्कृति में ​बच्चे भगवान का रूप माने जाते हैं. इन बच्चों को सुरक्षित माहौल मिलना बेहद जरूरी है। आज समाज में बच्चों के साथ होने वाली उत्पीड़न की घटनाओं के कारण माता-पिता और समाज में चिंता बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में बच्चों को आत्मरक्षा  की शिक्षा, सही मार्गदर्शन और स्कूलों में यौन शिक्षा देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। ​‘गुड टच-बैड टच’ यानी सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श के बीच का अंतर बच्चों को समझाना बाल सुरक्षा का पहला कदम है। नर्सरी,आंगनवाड़ी से लेकर पहली-दूसरी कक्षा तक के बच्चों को इस बारे में पहले से जानकारी देना जरूरी है। माता-पिता को बच्चों को उनके शरीर के बारे में जानकारी देनी चाहिए और यह समझाना चाहिए कि किसी को भी उन्हें बेवजह छूने का अधिकार नहीं है।

​बच्चों को कोई भी अनुचित स्पर्श होने पर तुरंत "ना" कहने का साहस दिखाना, किसी भरोसेमंद व्यक्ति को इसके बारे में बताना और संदिग्ध परिस्थितियों से दूर रहना सिखाना आवश्यक है। कई बार कोई परिचित व्यक्ति ही मीठी-मीठी बातें करके बच्चों का विश्वास जीत लेता है, इसलिए बच्चों के लिए सही और गलत स्पर्श को पहचानकर स्पष्ट रूप से मना करना बेहद जरूरी है। ​स्कूलों में ‘गुड टच-बैड टच’ विषय पर सामूहिक परामर्श,शिक्षकों द्वारा निगरानी और नियमित रूप से जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। स्कूल, स्कूल बस, पड़ोस या सार्वजनिक स्थानों पर होने वाली किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर माता-पिता और स्कूल प्रबंधन को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। ​बच्चों की सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि पूरे समाज की नैतिक जिम्मेदारी है। सुरक्षित बचपन के लिए ‘गुड टच-बैड टच’ की इस जानकारी को घर-घर तक पहुँचाकर इसे एक प्रभावी सामाजिक जागरूकता आंदोलन बनाने की आवश्यकता पर उन्होंने जोर दिया.

रिपोर्टर - रूपेंद्रसिंह सेंगर

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