सौर ऊर्जा ने बदला जीवन : पीएम-कुसुम से बदल रहा है ग्रामीण अर्थव्यवस्था

गांधीनगर - एक समय था,जब डांग के उमरगाडा गाँव के किसान रामूभाई वाघमारे के लिए वर्षा ही जीवन का आधार था। वर्षा ऋतु अच्छी रहे,तो फसल होती, अन्यथा पूरा वर्ष मुश्किलों में बीतता। सिंचाई के लिए रात में खेतों में जाना पड़ता, बिजली की अनिश्चितता तथा पानी की कमी एक कड़वी वास्तविकता थे। आज स्थिति बदल गई है। उनके खेत में स्थापित सोलर वॉटर पंप सूर्योदय से सूर्यास्त तक निरंतर पानी देता है। अब सिंचाई के लिए रात-रातभर जागना नहीं पड़ता। अब साल में एक से अधिक बार फसल उगाई जा सकती है। इस परिवर्तन के पीछे है केन्द्र सरकार की प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) योजना,जो गुजरात के आदिजाति क्षेत्रों में विकास का नया अध्याय लिख रही है। राज्य में हाल में 21 हजार से अधिक सोलर वॉटर पंप कार्यरत हैं। नर्मदा,डांग तथा तापी जैसे जिलों में हजारों किसान अब डीजल खर्च,बिजली की अनिश्चितता तथा वर्षा की सीमाओं से मुक्त बन रहे हैं। तापी के गवाण गाँव के गावजीभाई वसावा कहते हैं कि पहले खेती केवल वर्षा ऋतु तक सीमित थी। आज सोलर पंप की सहायता से वर्ष के दौरान किसान एक से अधिक फसल उगा सकते हैं। यहाँ धरतीपुत्र खेत में घास-चारा उगाकर पशुपालन के माध्यम से अतिरिक्त आय भी अर्जित करते हैं। नर्मदा जिले के जूना मोसदा गाँव के ईश्वरभाई वसावा के लिए तो यह योजना जीवन बदलने वाली सिद्ध हुई है। एक समय ऐसा था,जब खेती से पर्याप्त आय न मिलने के कारण रोजगार के लिए शहरों में मजदूरी करने जाना पड़ता था,परंतु अब वे वर्ष में तीन फसल उगा सकते हैं और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है। इस योजना की सफलता केवल किसानों के अनुभवों से ही नहीं, बल्कि योजना की की व्यापकता में भी दिखता है। पीएम-कुसुम के घटक-सी अंतर्गत गुजरात में 695 मेगावाट क्षमता के 256 सोलर पावर प्लांट कार्यरत हुए हैं, जिसके कारण अनुमानित 2.97 लाख खेतीबाड़ी पंपों का सोलराइजेशन हुआ है। राजकोट जिला 81 मेगावाट क्षमता के साथ राज्य में अग्रसर है। ऊर्जा मंत्री  ऋषिकेश पटेल के अनुसार यह योजना किसानों को ऊर्जा एवं पानी की सुरक्षा प्रदान करने के अलावा डीजल का उपयोग घटाकर पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

ऊर्जा मंत्री योजना का विवरण देते हुए कहते हैं, “इस योजना अंतर्गत तीन घटक ए, बी व सी लागू किए गए हैं। घटक-ए अंतर्गत 163 मेगावाट के पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) किए गए हैं, जिसका कार्य हाल में प्रगत्याधीन है, जबकि घटक-बी अंतर्गत जहाँ ग्रिड सप्लाई उपलब्ध न हो या टेक्नो-कॉमर्शियस दृष्टि से वायेबल न हो; ऐसे दूर-सुदूरस्थ क्षेत्रों, दूरदराजी प्रदेशों और वन-जंगल क्षेत्रों में सिंचाई के लिए / मौजूदा डीजल पंप सेट को हटाकर सोलर एग्रीकल्चर पंप स्थापित किए जाते हैं। योजनानुसार लाभार्थी को कुल सिस्टम खर्च की 30 प्रतिशत केन्द्र सरकार की सहायता (सीएफए) तथा 30 प्रतिशत राज्य सरकार की सब्सिडी मिलती है, जबकि शेष 40 प्रतिशत और अदेय सब्सिडी की राशि लाभार्थी किसान को देनी होती है। यह सहायता 7.5 होर्स पावर (एचपी) तक की क्षमता के पंप सेट के लिए ही है।”

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने जंगल क्षेत्र के किसानों के लिए विशेष उदारता दिखाते हुए अतिरिक्त सब्सिडी का विशेष प्रावधान किया है, जिसके अनुसार आदिजाति एवं वन क्षेत्र के किसानों केन्द्र सरकार की ओर से 30 प्रतिशत तथा राज्य सरकार की ओर से 70 प्रतिशत सब्सिडी दी जाती है। इसके चलते किसानों को एक रुपए का भी योगदान नहीं देना पड़ता है, जबकि गैरआदिजाति क्षेत्र एवं वन क्षेत्र के किसानों को केन्द्र की ओर से 30 व राज्य की ओर से 70 प्रतिशत सब्सिडी के साथ केवल न्यूनतम निर्धारित शुल्क ही देना होता है। इस घटक अंतर्गत अब तक 22,787 सोलर पंप कार्यरत किए गए हैं।
गुजरात के आदिजाति क्षेत्रों में आज सोलर पंप केवल एक टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि किसान के जीवन में विश्वास का प्रतीक है। ये पंप अधिक फसल, अधिक आय और अधिक अच्छी जीवनशैली का साधन हैं। आज जब देश प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी के सुशासन के 12 वर्षों की यात्रा का उत्सव मना रहा है, तब गुजरात के इन सुदूरवर्ती गाँवों में सौर ऊर्जा केवल खेतों के लिए ही नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन में प्रकाश ला रही है।

रिपोर्टर - राकेश शाह 

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