20 की उम्र में थकान क्यों? युवाओं में बर्नआउट का बढ़ता साया

कुछ दशक पहले तक "थकान" का रिश्ता उम्र से होता था। आजकल 22 की उम्र में ही लोग कह रहे हैं — “कुछ भी अच्छा नहीं लगता,” “मन ऊब गया है,” “सब थका देता है।”
ये बातें सिर्फ मन का वहम नहीं, बल्कि एक मानसिक स्थिति है जिसे हम बर्नआउट कहते हैं।


 क्या है बर्नआउट?

बर्नआउट एक ऐसा मनोवैज्ञानिक दबाव है जिसमें व्यक्ति लगातार थकान, असंतोष, और खालीपन महसूस करता है। ये दिमाग की एक ऐसी अवस्था है, जहाँ न तो काम में दिल लगता है, न ही आराम में सुकून मिलता है।


युवाओं में क्यों बढ़ रहा है बर्नआउट?

1. हमेशा “आगे” निकलने की होड़

हर कोई खुद से भी आगे निकल जाना चाहता है। कॉलेज में ही स्टार्टअप, स्किल्स, नेटवर्स, सब कुछ चाहिए — वो भी फटाफट। यह जल्दीबाज़ी थकावट की नींव बन जाती है।

2. 24x7 उपलब्धता का दबाव

मोबाइल नोटिफिकेशन बंद नहीं होते। हर मैसेज, हर मेल को जवाब देना ज़रूरी लगता है — वर्ना "आउटडेटेड" कहलाने का डर।

3. 'परफेक्ट' दिखने का तनाव

सोशल मीडिया पर हर कोई हँसता हुआ, घूमता हुआ और सफल दिखता है। इस नकली हँसी को असली मान कर हम खुद से ही नाराज़ रहने लगते हैं।

4. भावनात्मक अकेलापन

हज़ारों फॉलोअर्स होने के बावजूद दिल की बात कहने वाला एक भी इंसान नहीं। यही खालीपन धीरे-धीरे Burnout को जन्म देता है।


 इससे बाहर निकलने का रास्ता

  • खुद से मुकाबला करें, दूसरों से नहीं

हर किसी की रफ़्तार अलग होती है। अपनी दौड़ को समझें।

  •  डिजिटल ‘ना’ कहने की कला सीखें

एक दिन फोन बंद रखें। सिर्फ अपने लिए जिएं।

  •  दिमाग को भी सांस लेने दें

मेडिटेशन, प्रकृति में वक़्त बिताना और बिना गिल्टी फील किए आराम लेना बहुत जरूरी है।

  •  किसी से बात करें, खुलकर

चाहे दोस्त हो, माता-पिता या काउंसलर — बात कीजिए। सोच में ही उलझे रहना हल नहीं देता।


 थकना गलत नहीं, अनदेखा करना खतरनाक है

बर्नआउट एक आधुनिक जीवनशैली का साइड इफेक्ट है। लेकिन यह स्थायी नहीं है — अगर आप वक्त रहते इसे पहचान लें।
आपकी उम्र सपने देखने की है, खुद को खोने की नहीं।
धीरे चलिए, लेकिन खुद के साथ चलिए।

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