जिरेनियम खेती-गरीबों का गुलाब बनेगा किसानों की कमाई का सहारा

आज के दौर में किसान पारंपरिक फसलों से आगे बढ़कर नकदी और औषधीय फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। सुगंधित पौधों की खेती इसी बदलाव का हिस्सा है। इन्हीं में से एक है जिरेनियम (Geranium), जिसे “गरीबों का गुलाब” भी कहा जाता है। इसकी खेती कम लागत में अच्छी आमदनी देने वाली मानी जाती है।

सरकार का प्रोत्साहन

सुगंधित और औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार CSIR-CIMAP (केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान) और Aroma Mission के माध्यम से किसानों को प्रोत्साहित कर रही है। किसानों को उच्च गुणवत्ता के पौधे, प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाता है।

जिरेनियम क्यों है खास?

जिरेनियम के फूलों और पत्तियों से सुगंधित तेल निकाला जाता है, जिसकी खुशबू गुलाब जैसी होती है। यही कारण है कि इसे “गरीबों का गुलाब” कहा जाता है।
इस तेल का उपयोग

इत्र और परफ्यूम बनाने में
ब्यूटी और स्किन केयर उत्पादों में
सुगंधित साबुन और कॉस्मेटिक्स में
अरोमाथेरेपी और कुछ दवाओं में

बाजार में इसकी मांग स्थिर रहती है, जिससे किसानों को अच्छा दाम मिल सकता है।

खेती के लिए उपयुक्त परिस्थितियां

मिट्टी: बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
जलवायु: हल्की और कम नमी वाली जलवायु बेहतर उत्पादन देती है।
पानी की जरूरत: कम सिंचाई में भी अच्छी पैदावार संभव है।
खेती का क्षेत्र: कम बारिश वाले क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।

जिरेनियम की फसल लगभग 3-4 महीने में कटाई के लिए तैयार हो जाती है और साल में एक से अधिक बार कटाई संभव है।

कम लागत, ज्यादा लाभ

इस फसल में पारंपरिक अनाज की तुलना में कम पानी और कम देखभाल की जरूरत होती है। यदि किसान तेल निकालने की छोटी इकाई से जुड़ जाएं या किसी डिस्टिलेशन यूनिट से समझौता कर लें, तो मुनाफा और बढ़ सकता है।

कैसे शुरू करें?

किसान प्रमाणित पौधे CSIR-CIMAP जैसे संस्थानों से प्राप्त कर सकते हैं। सही तकनीक और बाजार से जुड़ाव के साथ जिरेनियम की खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का बेहतरीन विकल्प बन सकती है।

अगर खेती को व्यवसाय की तरह योजनाबद्ध तरीके से किया जाए, तो जिरेनियम जैसी सुगंधित फसलें किसानों को कम समय में बेहतर आमदनी दिला सकती हैं। बदलते समय में यह खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम साबित हो रही है।

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