भक्ति ही निराकार ईश्वर को साकार करती है: आचार्य विनय पाठक
गिरिडीह : खरगडीहा में आयोजित भव्य महायज्ञ के चतुर्थ दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। इस अवसर पर काशी के प्रख्यात कथावाचक आचार्य विनय पाठक जी ने "ईश्वर का स्वरूप और भक्ति की शक्ति" विषय पर मर्मस्पर्शी प्रवचन दिया।
भगवान कहाँ और कैसे हैं?
आचार्य जी ने जिज्ञासु भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि अक्सर मनुष्य के मन में यह प्रश्न उठता है कि भगवान कहाँ हैं और वे कैसे दिखते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि परमात्मा मूलतः निराकार (Formless) हैं। वे सर्वव्यापी हैं और कण-कण में विद्यमान हैं, ठीक उसी तरह जैसे दूध में घी या तिल में तेल छिपा रहता है।
निराकार से साकार का सफर
प्रवचन के दौरान उन्होंने जोर देकर कहा कि यद्यपि ईश्वर निराकार हैं, लेकिन उन्हें साकार (Manifest) करने की एकमात्र कुंजी 'भक्ति' है। आचार्य जी ने उदाहरण देते हुए समझाया कि जिस प्रकार जल वाष्प बनकर निराकार रूप में हवा में रहता है, लेकिन ठंडक (भक्ति का प्रेम) मिलने पर वह बर्फ बनकर साकार रूप धारण कर लेता है, वैसे ही भक्त की अनन्य प्रेममयी भक्ति निराकार ईश्वर को साकार रूप में प्रकट होने पर विवश कर देती है।
भक्ति की आवश्यकता
उन्होंने भक्तों से आह्वान किया कि वे अपने भीतर के अहंकार का त्याग करें, क्योंकि अहंकार ही जीव और ईश्वर के बीच का पर्दा है। बिना शुद्ध भक्ति और समर्पण के उस अनंत सत्ता का अनुभव करना असंभव है।
महायज्ञ के चौथे दिन का समापन आरती और प्रसाद वितरण के साथ हुआ, जिसमें क्षेत्र के हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
रिपोर्टर : आशीष भदानी


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