‘स्टील हब’ के सपनों के बीच आदिवासी मां की दर्दनाक यात्रा!
गडचिरोली : देश को आजाद हुए 79 वर्ष पूरे होने के बावजूद गड़चिरोली जिले के दुर्गम और आदिवासीबहुल क्षेत्रों में आज भी बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह नहीं पहुंच पाई हैं। एक ओर गड़चिरोली को ‘स्टील हब’ बनाने के बड़े-बड़े सपने दिखाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिले के ही एटापल्ली तहसील के गांवों में गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने के लिए डेढ़ किलोमीटर तक स्ट्रेचर पर ले जाना पड़ रहा है। यह घटना विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की गहरी खाई को उजागर करती है। एटापल्ली तहसील के कसनसूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के अंतर्गत आने वाले कोईंदूल गांव में 20 जुलाई 2026 को यह दर्दनाक स्थिति सामने आई। गांव की 30 वर्षीय गर्भवती महिला पुष्पा सुनील परसा को प्रसव पीड़ा शुरू होने के बाद स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को गांव तक पहुंचना पड़ा। लेकिन गांव तक पक्का सड़क मार्ग नहीं होने और रास्ते में नाला होने के कारण एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच सकी।
इसके बाद स्वास्थ्य कर्मियों ने प्रसव पीड़ा से जूझ रही पुष्पा परसा को स्ट्रेचर पर लिटाकर करीब डेढ़ किलोमीटर तक पैदल ले जाया। इसके बाद उन्हें एंबुलेंस से कसनसूर ले जाया गया, जहां उन्होंने सुरक्षित रूप से एक बच्ची को जन्म दिया। बाद में आगे के उपचार के लिए उन्हें गड़चिरोली भेजा गया। फिलहाल मां और बच्ची दोनों सुरक्षित बताए जा रहे हैं।
पांच नालों के घेरे में चार गांव, बारिश में दुनिया से कट जाता है संपर्क
कोईंदूल, रेकनार, गड़दापल्ली और गुम्मड़ी—ये चारों गांव जंगल क्षेत्र में स्थित और आदिवासीबहुल हैं। इन गांवों के लोगों को कसनसूर अथवा तहसील मुख्यालय तक पहुंचने के लिए रास्ते में दो बड़े और तीन छोटे, कुल पांच नालों को पार करना पड़ता है। बरसात के दिनों में भारी बारिश के कारण जब ये नाले उफान पर होते हैं, तब चारों गांवों का बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग पूरी तरह टूट जाता है। एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती, मरीजों को कंधे या स्ट्रेचर पर ले जाना पड़ता है, विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होती है और जरूरी कामों के लिए ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर आवागमन करना पड़ता है। कोईंदूल की गर्भवती महिला को प्रसव के लिए डेढ़ किलोमीटर तक स्ट्रेचर पर ले जाने की घटना इसी भयावह जमीनी हकीकत का ताजा उदाहरण है। एक ओर करोड़ों का राजस्व, दूसरी ओर सड़क के लिए संघर्ष एटापल्ली तहसील लौह अयस्क के कारण देशभर में चर्चा में है। इस क्षेत्र से सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। गड़चिरोली जिले को ‘स्टील हब’ बनाने की योजनाओं और विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस गड़चिरोली जिले के पालकमंत्री भी हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जिस जिले को औद्योगिक विकास का केंद्र बनाने की बात कही जा रही है, उसी जिले के एक गांव में गर्भवती महिला को एंबुलेंस तक पहुंचाने के लिए डेढ़ किलोमीटर तक स्ट्रेचर पर क्यों ले जाना पड़ता है? क्या यही विकास का वास्तविक चेहरा है?
गोटाटोला के बाद भी नहीं जागा प्रशासन
गोटाटोला में सामने आई ऐसी ही घटना के बाद भी प्रशासन ने कोई ठोस सबक नहीं लिया। अब कोईंदूल में एक बार फिर वही स्थिति दोहराई गई है। बड़े-बड़े विकास कार्यों और घोषणाओं के बीच आज भी चार गांव पांच नालों के घेरे में फंसे हुए हैं।
नागरिकों का कहना है कि सरकार और प्रशासन को केवल आश्वासन और विकास की घोषणाओं तक सीमित न रहते हुए कोईंदूल समेत सड़कविहीन सभी गांवों में तत्काल पक्के सड़क मार्ग और नालों पर स्थायी पुलों का निर्माण करना चाहिए।
‘लोकप्रतिनिधि कब जागेंगे?’
नागरिकों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि जब एटापल्ली क्षेत्र से सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व मिल रहा है, तब यहां के ग्रामीणों को आज भी सड़क, पुल और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा के दौरान डेढ़ किलोमीटर तक स्ट्रेचर पर ले जाने की नौबत आने के बाद भी यदि प्रशासन और लोकप्रतिनिधि नहीं जागते, तो जनता यह सवाल पूछने पर मजबूर होगी—‘क्या चार गांवों की पीड़ा किसी को दिखाई नहीं देती?’ अब देखना यह है कि कोईंदूल, रेकनार, गड़दापल्ली और गुम्मड़ी के ग्रामीणों को केवल आश्वासन मिलता है या फिर वास्तव में सड़क और नालों पर स्थायी पुलों का निर्माण कर उन्हें बरसात में हर साल होने वाली इस यातना से मुक्ति मिलती है।
रिपोर्टर : संजय यमसलवार
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