3000 करोड़ खर्च फिर भी गंदी गोमती! लखनऊ में खुलेआम नदी में गिर रहा सीवर
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गोमती नदी को निर्मल बनाने के दावे एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। करोड़ों रुपये खर्च हुए, योजनाएं बनीं, बैठकें हुईं, निर्देश जारी हुए, लेकिन गोमती में गंदे नालों और सीवर का पानी गिरना आज भी नहीं रुका। जी हां जिस नदी को साफ करने के नाम पर पिछले कुछ दशकों में 3000 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं, उसी गोमती में आज भी शहर के नाले खुलेआम गंदगी उड़ेल रहे हैं। हालात ये हैं कि लखनऊ के आधा दर्जन से ज्यादा बड़े नाले सीधे गोमती नदी में गिर रहे हैं, जबकि शहर के करीब 52 प्रतिशत इलाके में अभी तक सीवर लाइन का नेटवर्क ही नहीं है। और सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर करोड़ों खर्च होने के बाद भी गोमती की गंदगी खत्म क्यों नहीं हुई?
वहीं सरकार की योजनाओं और अधिकारियों की रिपोर्ट के बीच जमीन पर तस्वीर कुछ और ही नजर आ रही है। पिछले दिनों हुई उच्चस्तरीय बैठक में मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत ने नगर निगम, जलकल विभाग और जल निगम की अधूरी रिपोर्ट पर नाराजगी जताई। मंडलायुक्त ने साफ निर्देश दिया कि जब तक यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि गोमती नदी में एक बूंद भी सीवर नहीं जाएगा, तब तक कोई नई कार्ययोजना आगे नहीं बढ़ाई जाएगी। उन्होंने अधिकारियों से सीधा सवाल किया कि आखिर कितना सीवर पाइपलाइन के जरिए एसटीपी तक पहुंच रहा है? कितना सीवर नालों के रास्ते एसटीपी तक जा रहा है? और कितने मोहल्लों का सीवर बिना ट्रीट हुए सीधे नदी में घुल रहा है? यानी कागजों में सफाई का दावा बहुत है, लेकिन असली सवाल है कि गोमती के पानी में कितना सीवर जा रहा है?
आपको बता दें गोमती को साफ और सुंदर बनाने के लिए अलग-अलग समय में कई बड़ी योजनाएं चलाई गईं। पिछले कुछ दशकों में नदी को संवारने और प्रदूषण रोकने के नाम पर 3000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जाने का दावा है। इसके बावजूद नदी में गंदे नालों और सीवर का पानी पहुंचना बंद नहीं हुआ। सबसे बड़ा उदाहरण साल 2015 का गोमती रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट है। तत्कालीन अखिलेश सरकार ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को शुरू किया था। इसका मूल बजट करीब 656 करोड़ रुपये था। बाद में कैग की रिपोर्ट में परियोजना पर करीब 1435 करोड़ रुपये खर्च होने का खुलासा हुआ, जबकि काम लगभग 60 से 70 प्रतिशत तक ही पूरा हो पाया था। वहीं साल 2017 में योगी सरकार ने रिवरफ्रंट परियोजना में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच सीबीआई को सौंप दी।
जांच के बाद सिंचाई विभाग के कई बड़े अधिकारियों को जेल भी जाना पड़ा। लेकिन सवाल आज भी वही है कि इतना पैसा खर्च होने के बाद भी गोमती में गंदगी का रास्ता क्यों नहीं बंद हुआ? वहीं दूसरी तरफ गोमती में प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह नदी में सीधे गिरने वाले नाले बताए जा रहे हैं। जी हां रिपोर्ट के मुताबिक नगरिया, पाटानाला और सरकटा नाला सीधे गोमती नदी में गिर रहे हैं। इसके अलावा डाउनस्ट्रीम में हैदर कैनाल की गंदगी भी नदी तक पहुंच रही है। लखनऊ शहर में कुल 32 बड़े नाले बताए गए हैं, जिनमें से आधा दर्जन से अधिक नाले सीधे गोमती में गिर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब नदी में गंदे पानी के सीधे प्रवेश का रास्ता ही बंद नहीं हुआ, तो फिर गोमती को निर्मल बनाने की योजनाओं का असली असर कैसे दिखाई देगा?
वहीं पिछले साल गोमती तट पर छठ महोत्सव के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोमती नदी को पूरी तरह निर्मल बनाने की घोषणा की थी। इसकी निगरानी की जिम्मेदारी मंडलायुक्त को सौंपी गई थी। इसके बाद 3 जनवरी को मुख्यमंत्री ने खुद गोमती सफाई योजना की समीक्षा की और नदी में जा रहे सीवर की मोहल्लावार पूरी रिपोर्ट तलब की। मंडलायुक्त ने जलकल विभाग से प्रमुख बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी। अब नगर निगम के साथ मिलकर इन दोनों लाइनों को अलग करने की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। यानी समस्या सिर्फ नदी किनारे नहीं है। शहर के भीतर ही नाली और सीवर का नेटवर्क कई जगह एक-दूसरे में मिल रहा है और यही गंदा पानी आगे चलकर गोमती तक पहुंचने का खतरा पैदा कर रहा है। दरअसल, लखनऊ में मौजूदा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता भी कम नहीं है।
भरवारा- 345 MLD
दौलतगंज -42 और 14 MLD
हैदर कैनाल -120 MLD
सीजी सिटी -19 MLD
वृंदावन कॉलोनी, सेक्टर-10 -6.5 MLD
हाथी पार्क -1.5 MLD
इसके बावजूद कई इलाकों में सीवर और नालियों के पानी के मिश्रण की समस्या बनी हुई है। यानी सवाल सिर्फ एसटीपी की क्षमता का नहीं है। असली चुनौती यह है कि गंदा पानी एसटीपी तक पहुंचे कैसे? अगर सीवर लाइन ही नहीं है, नाली और सीवर आपस में मिल रहे हैं और बड़े नाले सीधे नदी में गिर रहे हैं, तो फिर एसटीपी तक पहुंचने से पहले ही गंदा पानी गोमती में पहुंच सकता है। ऐसे में सवाल बिल्कुल सीधा है कि गोमती को निर्मल बनाने का सपना आखिर कब हकीकत बनेगा?
क्या नई योजनाएं जमीन पर उतरेंगी या फिर एक बार फिर फाइलों में ही तैयार होकर रह जाएंगी? क्योंकि गोमती को सिर्फ कागजों पर साफ नहीं किया जा सकता। जब तक नदी में गिरने वाले हर नाले और हर बूंद सीवर का रास्ता बंद नहीं होगा, तब तक ‘निर्मल गोमती’ का दावा अधूरा ही रहेगा। अब देखना होगा कि मंडलायुक्त के सख्त निर्देश के बाद अधिकारी सिर्फ रिपोर्ट तैयार करते हैं या वास्तव में गोमती में गंदा पानी जाने का रास्ता बंद भी कर पाते हैं।
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