संशोधन सम्बन्धी प्रस्ताव अधिवक्ता हितों के विपरीत होने के कारण बार एसोसिएशन द्वारा आपत्ति जताते हुये रद्द करने की मांग
गोंडा : बार कौंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के सचिव द्वारा भेजे गये पत्रांक 699/2026 दिनांक-21.07.2026 उपरोक्त पत्र के साथ अधिवक्ता अधिनियम 1961 में प्रस्तावित संशोधन का बार एसोसिएशन गोण्डा घोर विरोध निम्नलिखित कारणों से करता है-
(अ) उपरोक्त संसोधन के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि अधिवक्ताओं को महज मानसिक तौर पर प्रताड़ित करने व अपमानित करने हेतु उपरोक्त संशोधन महज बार कौंसिल ऑफ इंडिया व सरकार तथा कुछ अधिवक्ता संगठनों द्वारा आपसी जुगलबंदी का परिणाम है। इसलिए बार एसोसिएशन गोण्डा इस पर सख्त आपत्ति करते हुये विरोध करता है।
(ब) उपरोक्त संशोधन के जरिये जूनियर अधिवक्ताओं की रजिस्ट्रेशन फीस जो मा० उच्चतम न्यायालय के निर्णय और एडवोकेट्स एक्ट 1961 के प्रविधानों के विपरीत मु० 750/- रूपये से बढ़ाकर लगभग 23000/- थोपे जाने से जूनियर अधिवक्ताओं पर काफी आर्थिक दबाव पड़ेगा व तमाम आर्थिक रूप से कमजोर अधिवक्ताओं को बार कौंसिल ऑफ उ०प्र० में रजिस्ट्रेशन करा पाने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। इसलिए बार एसोसिएशन गोण्डा इसका घोर विरोध करता है।
(स) उक्त संशोधन में जूनियर अधिवक्ताओं को प्रारम्भिक तौर पर उन्हें विधि व्यवसाय में जमाने हेतु उन्हें विधि की पुस्तके (लाइब्रेरी) स्थापित करने, बार कौंसिल से कोई आर्थिक सहयोग एवं प्रोत्साहन भत्ता की बात एडवोकेट्स एक्ट संशोधन में शामिल नहीं किया गया है। इसलिए संलग्न संशोधन प्रस्ताव पर घोर आपत्ति और विरोध है।
(द) चूंकि उपरोक्त संशोधन में अस्वस्थ एवं वृद्ध ऐसे अधिवक्ताओं जो विधि व्यवसाय कर पाने में असमर्थता प्रकट करते हो उनके जीवन यापन हेतु उन्हें बार कौंसिल द्वारा पेंशन दिये जाने की कोई व्यवस्था नहीं हैं। इसलिए उपरोक्त संशोधन का हम लोग पुरजोर विरोध करते हैं।
(य) चूंकि पत्र साथ संलग्न संशोधन प्रस्ताव में अधिवक्ताओं की सुरक्षा के सम्बन्ध में कोई जिक्र नहीं है, जबकि वर्तमान समय में विधि व्यवसाय में अधिवक्ताओं की सुरक्षा को हमेशा खतरा बना रहता है, इसलिए कहीं भी अधिवक्ता प्रोटेक्शन से सम्बन्धित कानून बनाने व सुरक्षा सम्बन्धी कोई प्रस्ताव नहीं है। इसलिए हम लोग इसका विरोध करते है।
(र) यह कि हर समाज में अपराधी विचार के कुछ न कुछ लोग अवश्य होते हैं, लेकिन उन पर अंकुश लगाने के लिये कुछ ऐसे ठॉस उपाय किये जाने के साथ ही साथ यह सावधानी भी बरती जानी चाहिए कि उक्त उपाय (कार्यवाही) का अनुचित लाभ सुरक्षा ऐजेन्सिया (पुलिस व अधिकारीगण), सरकारी तन्त्र न उठा पायें।
अन्यथा कुछ भ्रष्ट सरकारी तन्त्र में बैठे लोग समाज के सबसे प्रबुद्ध वर्ग को हैरान व परेशान करने के लिये उक्त मुकदमें दर्ज कराने के निर्णय को अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल कर निर्दोष अधिवक्ताओं को भी प्रताड़ित करने का काम करने लगेंगे। लिहाजा ऐसा भी कोई निर्णय बार कौंसिल द्वारा नहीं लिया जाना चाहिए।
अतः हम लोग पत्र के साथ संलग्न संशोधन ड्राफ्ट के सभी बिन्दुओं पर अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुये आपसे आग्रह है कि एडवोकेट एक्ट, 1961 में इस तरह के कोई संशोधन वर्तमान समय में उचित नहीं है।
रिपोर्टर : राजेश कुमार जायसवाल
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