क्या Google Location बन सकती है आपके Insurance Claim का सबसे बड़ा दुश्मन?

सोचिए, आप बीमार पड़ते हैं, अस्पताल में भर्ती होते हैं, इलाज करवाते हैं, मोटा बिल बनता है, और आप राहत की सांस लेते हैं कि आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है जो यह खर्चा कवर करेगा। आप सारे दस्तावेज जमा कर देते हैं, नियमों के अनुसार सारी प्रक्रियाएं पूरी कर लेते हैं। लेकिन फिर एक दिन फोन आता है — “क्लेम रिजेक्ट कर दिया गया है।” वजह? आपकी Google Location History में अस्पताल का ज़िक्र ही नहीं है।
यह सुनकर हैरानी होती है, लेकिन आजकल बीमा कंपनियां ऐसा ही कर रही हैं। अब सिर्फ डॉक्टर्स की रिपोर्ट और अस्पताल के बिल काफी नहीं हैं — अब आपका स्मार्टफोन भी गवाही देगा कि आप वाकई अस्पताल में थे या नहीं।
जब गूगल लोकेशन ने छीन लिया इलाज का हक
Vallabh Motka नामक व्यक्ति के साथ ऐसा ही कुछ हुआ। उन्होंने Go Digit General Insurance से 6.5 लाख रुपये की मेडिक्लेम पॉलिसी खरीदी थी, जो फरवरी 2025 तक वैध थी। सितंबर 2024 में उन्हें वायरल निमोनिया हुआ और 11 तारीख को अस्पताल में भर्ती किया गया। इलाज के बाद 14 सितंबर को छुट्टी मिली, और अस्पताल का कुल बिल था 48,251 रुपये।
Motka ने सारे डॉक्यूमेंट्स समय पर जमा कर दिए। लेकिन कंपनी ने उनका दावा यह कहते हुए ठुकरा दिया कि गूगल टाइमलाइन के मुताबिक वह अस्पताल में थे ही नहीं। यानी मोबाइल लोकेशन डेटा में अस्पताल की कोई प्रविष्टि नहीं दिखी, और इसलिए बीमा कंपनी को शक हुआ कि अस्पताल में भर्ती की घटना फर्जी हो सकती है।
क्या बीमा कंपनियां आपकी लोकेशन डेटा की जांच कर सकती हैं?
इस सवाल पर बहस छिड़ चुकी है। कई विशेषज्ञ इसे निजता का उल्लंघन मानते हैं, तो कुछ इसे आधुनिक डेटा सत्यापन की अनिवार्यता बता रहे हैं। Economic Times की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में बीमा कंपनी ने कहा कि Google Location Data मरीज की सहमति से प्राप्त किया गया था। लेकिन कंज्यूमर फोरम ने इस आधार को खारिज करते हुए कंपनी को मरीज को पूरी रकम चुकाने का आदेश दिया।
क्या अब गूगल बन गया है बीमा का गवाह?
यह मामला सिर्फ एक उदाहरण नहीं है। टेक्नोलॉजी के इस युग में बीमा कंपनियां अब क्लेम सत्यापन के लिए डिजिटल ट्रेस — जैसे कि Google Timeline, फोन की जियो-टैग लोकेशन, और यहां तक कि सोशल मीडिया ऐक्टिविटी — की मदद ले रही हैं।
लेकिन सवाल ये है कि क्या ये तरीका न्यायसंगत है? क्या बीमार व्यक्ति से यह उम्मीद की जा सकती है कि उसका मोबाइल हर समय ऑन हो, लोकेशन चालू हो, और वह खुद को डिजिटल रूप से 'प्रूव' करता फिरे?
उपभोक्ता के अधिकार बनाम डिजिटल निगरानी
इस तरह के मामलों से उपभोक्ताओं के अधिकारों और बीमा कंपनियों की सत्यापन प्रक्रियाओं के बीच एक टकराव की स्थिति बन रही है। एक तरफ कंपनियां धोखाधड़ी से बचना चाहती हैं, तो दूसरी तरफ एक आम आदमी को यह समझ ही नहीं आता कि उसके फोन की सेटिंग उसके लाखों के क्लेम को खारिज करवा सकती है।
Vallabh Motka के केस में फोरम का फैसला उपभोक्ताओं के पक्ष में जरूर गया, लेकिन इसने यह सवाल ज़रूर खड़ा कर दिया कि भविष्य में बीमा दावों का फैसला किस पर आधारित होगा — डॉक्टरी प्रमाणपत्रों पर, या हमारे मोबाइल की डिजिटल गवाही पर?
यह मामला न सिर्फ बीमा इंडस्ट्री के बदलते रुख को उजागर करता है, बल्कि हमें यह सोचने पर भी मजबूर करता है कि हमारी डिजिटल पहचान कितनी ताकतवर होती जा रही है। बीमा क्लेम सिर्फ इलाज से जुड़ा मामला नहीं रह गया — अब यह टेक्नोलॉजी, निजता और कानून की जटिल लड़ाई बनता जा रहा है।
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