बसंती बयार : जीवन को नव अर्थ देने वाली दिशा है

बिहार : बसंत ऋतु भारतीय प्रकृति की सबसे मनोहारी और आनंददायक ऋतु मानी जाती है। शीत ऋतु की ठिठुरन और ग्रीष्म की तपन के बीच जब हल्की-हल्की सुहानी हवा बहती है, तो उसे ही बसंती बयार कहा जाता है। यह बयार न केवल वातावरण को मधुर बनाती है, बल्कि मनुष्य के मन में भी नई ऊर्जा, उत्साह और उल्लास भर देती है।

बसंती बयार के आते ही प्रकृति का रूप मानो निखर उठता है। पेड़ों पर नई कोपलें फूट पड़ती हैं, खेतों में सरसों के पीले फूल लहराने लगते हैं और आम के पेड़ों पर मंजरियों की खुशबू चारों ओर फैल जाती है। आकाश स्वच्छ और नीला दिखाई देता है, पक्षियों की चहचहाहट वातावरण को संगीतमय बना देती है। यह बयार प्रकृति के हर कण में नवजीवन का संचार करती है।
बसंती बयार का प्रभाव केवल प्रकृति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मानव जीवन पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। इस समय लोगों के मन में प्रसन्नता और स्फूर्ति बढ़ जाती है। किसान अपनी फसलों को देखकर संतोष का अनुभव करते हैं। विद्यार्थी और युवा वर्ग में नई आशाओं का संचार होता है। मन में कुछ नया करने की प्रेरणा जागृत होती है।
भारतीय संस्कृति में बसंत ऋतु का विशेष महत्व है। इस ऋतु में वसंत पंचमी का पर्व मनाया जाता है, जो ज्ञान की देवी माँ सरस्वती को समर्पित है। पीले वस्त्र, पीले पुष्प और मधुर संगीत बसंती बयार के उल्लास को और भी बढ़ा देते हैं। कवियों और कलाकारों के लिए यह ऋतु सृजन की प्रेरणा रही है। अनेक कविताएँ, गीत और चित्र बसंती बयार की सुंदरता का वर्णन करते हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो बसंती बयार जीवन में आशा, नवीनता और आनंद का प्रतीक है। यह हमें निराशा और आलस्य से बाहर निकालकर उल्लास और सृजनशीलता की ओर ले जाती है। प्रकृति और मानव जीवन के बीच सामंजस्य को दर्शाती बसंती बयार सचमुच जीवन को मधुर बना देती है।
बसंती बयार केवल मौसम का परिवर्तन नहीं है, यह जीवन के ठहरे हुए पन्नों पर चलने वाली वह हवा है जो शब्दों में रंग, मन में उमंग और आत्मा में आशा भर देती है। शीत ऋतु की लंबी उदासी के बाद जब धरती के कंधों पर हल्की गर्माहट उतरती है, तब बसंत अपने कोमल चरणों से जीवन के द्वार पर दस्तक देता है।
पेड़ों की सूखी डालियाँ, जो कल तक मौन खड़ी थीं, आज नव पल्लवों से सज जाती हैं। यह परिवर्तन किसी जादू से कम नहीं लगता—पर वास्तव में यह प्रकृति का वह शाश्वत संदेश है जो हमें सिखाता है कि हर ठहराव के बाद गति निश्चित है।
एक गाँव में वर्षों से एक पुराना वृक्ष खड़ा था। लोग कहते थे—“यह अब जीवित नहीं रहा।” बच्चे उसकी छाया में खेलना छोड़ चुके थे, पक्षी भी उस पर बसेरा नहीं करते थे।
पर जैसे ही बसंती बयार चली, उसी वृक्ष की एक डाल पर कोमल कली फूट पड़ी। कुछ ही दिनों में वह हरा-भरा हो गया।
यह दृश्य देखकर गाँव के बुज़ुर्ग ने कहा—
“जो बाहर से सूखा दिखता है, वह भीतर से मरा हो—यह ज़रूरी नहीं। बस सही समय और सही हवा चाहिए।”
यही संदेश बसंती बयार मानव जीवन को भी देती है।
मनुष्य का जीवन भी ऋतुओं की तरह है। कभी शीत—जहाँ निराशा जम जाती है, कभी ग्रीष्म—जहाँ संघर्ष की तपन झुलसा देती है। लेकिन जब बसंत आता है, तो वही मन जो थक चुका था, फिर से सपने बुनने लगता है।
कवि की कलम, किसान का खेत, विद्यार्थी की आशाएँ—सब बसंती बयार के स्पर्श से जीवंत हो उठते हैं।
रवि नाम का एक छात्र बार-बार असफल हो चुका था। उसने पढ़ाई छोड़ने का मन बना लिया। उसे लगता था—“अब मुझसे कुछ नहीं होगा।”
एक दिन वह उदास मन से सरसों के खेतों के बीच से गुज़रा। पीले फूल हवा में झूम रहे थे, मानो कह रहे हों—“हम भी बीज थे, मिट्टी में दबे थे।”
उसी दिन रवि ने फिर से प्रयास करने का निर्णय लिया। कुछ समय बाद वही छात्र सफल हुआ।
उसने स्वीकार किया—
“बसंती बयार ने नहीं, उस बयार के संदेश ने मुझे बदला।”
बसंत केवल व्यक्तिगत परिवर्तन का नहीं, सामूहिक उल्लास का भी प्रतीक है। होली के रंग, पीले वस्त्र, मधुर गीत—सब मिलकर जीवन के उत्सव को पूर्ण करते हैं। यह ऋतु सिखाती है कि जीवन केवल संघर्ष नहीं, उत्सव भी है।
एक समय एक गाँव आपसी वैमनस्य में डूबा था। लोग एक-दूसरे से बात तक नहीं करते थे। बसंत आया और होली का दिन भी। बच्चों ने रंगों से खेलना शुरू किया। धीरे-धीरे बड़े भी हँसी में शामिल हो गए।
रंगों ने दीवारें नहीं, दूरी पिघलाई।
उस दिन गाँव ने जाना—
“जब मन बसंती हो जाए, तो संबंध फिर से खिल सकते हैं।”
बसंती बयार का शाश्वत संदेश
बसंती बयार हमें सिखाती है—"निराशा स्थायी नहीं होती"
हर अंत के बाद नव आरंभ होता है
जीवन को फिर से जीने का साहस भीतर ही होता है यह हवा कानों में नहीं, आत्मा में बहती है।
बसंती बयार एक ऋतु नहीं, एक दृष्टि है—जो जीवन को आशा की आँखों से देखना सिखाती है। जब भी जीवन बोझिल लगे, मन में शीत जमे, तब बसंती बयार को याद करना चाहिए—क्योंकि वह कहती है—
“रुको मत, खिलने का समय आ रहा है।”

लेखिका- सुनीता कुमारी

 

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