लोकतंत्र में राजनीति को समाज सेवा का सर्वोच्च माध्यम माना जाता है, मगर हकीकत कुछ और है

सूरत - राजनीति को समाज सेवा का सर्वोच्च माध्यम माना जाता है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता की आशाओं, आकांक्षाओं और अधिकारों के संरक्षक होते हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे ईमानदारी, पारदर्शिता और नैतिकता के साथ देश और समाज का नेतृत्व करें। किंतु जब आम नागरिक राजनीति की वर्तमान स्थिति को देखता है, तो उसके मन में यह कटु विचार जन्म लेता है कि *"राजनीति ही एकमात्र ऐसा पेशा है जहाँ आप झूठ बोल सकते हैं, धोखा दे सकते हैं और चोरी कर सकते हैं, और फिर भी सम्मानित बने रह सकते हैं।"* यह कथन समाज में व्याप्त उस निराशा और अविश्वास को व्यक्त करता है, जो वर्षों से राजनीतिक व्यवस्था के प्रति लोगों के मन में बढ़ता जा रहा है।

हालाँकि यह कथन पूरी राजनीति या सभी राजनेताओं पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता, फिर भी इसमें छिपी पीड़ा और यथार्थ को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जब भ्रष्टाचार, झूठे वादे, सत्ता का दुरुपयोग और जवाबदेही की कमी बार-बार सामने आती है, तब लोगों का विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास होता है, और जब यही विश्वास डगमगाने लगे, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था भी कमजोर पड़ने लगती है।

लोकतंत्र चुनावों पर आधारित व्यवस्था है। चुनाव के समय राजनीतिक दल जनता से अनेक वादे करते हैं—रोज़गार, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की आय बढ़ाने, भ्रष्टाचार समाप्त करने और विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद अक्सर इन वादों का बड़ा हिस्सा अधूरा रह जाता है। जनता पाँच वर्षों तक उन्हीं वादों की याद दिलाती रहती है, जबकि नेता नई राजनीतिक रणनीतियों में व्यस्त हो जाते हैं। यही कारण है कि लोगों को लगता है कि राजनीति में झूठ बोलना एक सामान्य बात बन गई है। जब वादे पूरे नहीं होते, तब जनता के मन में यह भावना भी जन्म लेती है कि चुनाव केवल आश्वासनों का माध्यम बनकर रह गए हैं।

राजनीति में धोखे का दूसरा रूप दल-बदल की संस्कृति है। अनेक नेता चुनाव किसी एक विचारधारा और दल के नाम पर जीतते हैं, लेकिन सत्ता या पद के लालच में बाद में दूसरे दल में चले जाते हैं। इससे मतदाताओं के विश्वास को ठेस पहुँचती है। जनता जिस विचार और नीति के आधार पर मतदान करती है, वही प्रतिनिधि बाद में अपने व्यक्तिगत हितों के लिए उस विश्वास को तोड़ देता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध माना जाता है और लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

भ्रष्टाचार राजनीति की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। समय-समय पर विभिन्न स्तरों पर घोटालों और आर्थिक अनियमितताओं के आरोप सामने आते रहे हैं। सरकारी धन का दुरुपयोग, रिश्वतखोरी, ठेकों में अनियमितता और सार्वजनिक संसाधनों का निजी लाभ के लिए इस्तेमाल लोकतंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। जब ऐसे आरोपों के बावजूद कुछ नेता चुनाव जीतते रहते हैं और सार्वजनिक मंचों पर सम्मान प्राप्त करते हैं, तब आम नागरिक के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीति में नैतिकता का महत्व कम हो गया है?

उदाहरण के लिए, यदि कोई जनप्रतिनिधि चुनाव से पहले अपने क्षेत्र में अस्पताल, सड़क, पेयजल और रोजगार की व्यवस्था करने का वादा करता है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद वर्षों तक उन मुद्दों पर कोई ठोस कार्य नहीं करता और अगली बार फिर नए वादों के साथ जनता के बीच पहुँच जाता है, तो स्वाभाविक रूप से मतदाताओं का विश्वास कमजोर होता है। ऐसा अनुभव केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि समय-समय पर देश के विभिन्न हिस्सों में जनता द्वारा व्यक्त की जाने वाली शिकायतों में भी दिखाई देता है।

राजनीति में सम्मान का आधार केवल चरित्र नहीं, बल्कि लोकप्रियता, संगठन, जातीय समीकरण, आर्थिक शक्ति और चुनावी सफलता भी बन जाते हैं। यदि कोई नेता प्रभावशाली है, बड़ी जनसभा जुटा सकता है या चुनाव जीत सकता है, तो उसके ऊपर लगे आरोप भी कई बार जनता के एक वर्ग को प्रभावित नहीं करते। यही स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती बनती है।

मीडिया और सोशल मीडिया के विस्तार ने राजनीति को और अधिक प्रभावशाली बना दिया है। आज किसी भी घटना को अपनी सुविधा के अनुसार प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है। कई बार वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाकर भावनात्मक या विवादास्पद विषयों पर चर्चा केंद्रित कर दी जाती है। इससे जनता का ध्यान शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी, महँगाई और कृषि जैसी मूल समस्याओं से हट सकता है। ऐसे माहौल में सत्य और असत्य के बीच अंतर करना सामान्य नागरिक के लिए कठिन हो जाता है। इसलिए नागरिकों को भी प्रत्येक सूचना की सत्यता परखने की आदत विकसित करनी चाहिए।

हालाँकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि राजनीति पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी है। भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में ऐसे नेता भी हुए हैं जिन्होंने ईमानदारी, सादगी और जनसेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने व्यक्तिगत लाभ के बजाय समाज और राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी। ऐसे नेताओं के कारण ही लोकतंत्र में लोगों की आस्था बनी रहती है। इसलिए सभी राजनेताओं को एक ही दृष्टि से देखना न्यायसंगत नहीं होगा।

वास्तविक समस्या केवल नेताओं की नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक संस्कृति की भी है। यदि मतदाता जाति, धर्म, धन या तात्कालिक लाभ के आधार पर मतदान करेगा और उम्मीदवार के चरित्र, कार्य तथा नीतियों पर ध्यान नहीं देगा, तो राजनीति में सुधार कठिन होगा। लोकतंत्र में जनता ही अंतिम शक्ति होती है। जिस प्रकार के प्रतिनिधि जनता चुनेगी, वैसी ही शासन व्यवस्था विकसित होगी।

राजनीतिक दलों की आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी मजबूत करने की आवश्यकता है। उम्मीदवारों का चयन पारदर्शी हो, चुनावी चंदे का स्पष्ट हिसाब सार्वजनिक हो, आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों की जानकारी मतदाताओं तक पहुँचे और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित हो। साथ ही स्वतंत्र संस्थाओं को निष्पक्ष रूप से कार्य करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए ताकि भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच बिना किसी दबाव के हो सके।

शिक्षा भी राजनीति को बेहतर बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि नागरिक संविधान, अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक होंगे, तो वे भावनात्मक नारों के बजाय विकास और सुशासन के आधार पर निर्णय लेंगे। जागरूक मतदाता ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब नागरिक केवल मतदान ही नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों से जवाबदेही भी सुनिश्चित करेंगे।

राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज की सेवा करना होना चाहिए। यदि राजनीति से नैतिकता समाप्त हो जाएगी, तो लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित रह जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि राजनीतिक दल, नेता, मीडिया और नागरिक सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करें। राजनीति का वास्तविक उद्देश्य जनविश्वास अर्जित करना और उसे बनाए रखना होना चाहिए।

निष्कर्ष

**"राजनीति ही एकमात्र ऐसा पेशा है जहाँ आप झूठ बोल सकते हैं, धोखा दे सकते हैं और चोरी कर सकते हैं, और फिर भी सम्मानित बने रह सकते हैं"—यह कथन समाज की गहरी निराशा और व्यवस्था के प्रति असंतोष को व्यक्त करता है। इसमें कुछ वास्तविक अनुभवों की झलक अवश्य दिखाई देती है, किंतु इसे राजनीति का पूर्ण सत्य नहीं माना जा सकता। राजनीति में अनेक ईमानदार और समर्पित लोग भी हैं, जो जनसेवा को अपना धर्म मानते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि जनता विवेकपूर्ण मतदान करे, राजनीतिक दल जवाबदेह बनें और नैतिक मूल्यों को राजनीति का आधार बनाया जाए। तभी लोकतंत्र वास्तव में जनता के विश्वास, सम्मान और जनसेवा का सशक्त प्रतीक बन सकेगा।

रिपोर्टर - चंद्रकांत सी पूजारी 

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