दीयों की रोशनी से LED की चमक तक, कितना बदल गया त्योहार!
याद है वो दिवाली, जब घर के हर कोने में मिट्टी के दीये जलते थे, आंगन में रंगोली सजती थी और रसोई से घर में बनी मिठाइयों की खुशबू आती थी? जब नए कपड़ों से ज्यादा खुशी दोस्तों और परिवार के साथ त्योहार मनाने में होती थी। और आज? आज दिवाली की रौनक तो पहले से भी ज्यादा है, लेकिन क्या इसकी खुशियाँ भी वैसी ही रह गई हैं?
एक समय था जब दिवाली आने से कई दिन पहले ही घरों में उत्साह का माहौल बन जाता था। घर की सफाई से लेकर दीये खरीदने और मिठाइयाँ बनाने तक, हर काम में परिवार के सभी सदस्य शामिल होते थे। बच्चे बेसब्री से दिवाली का इंतजार करते थे। शाम होते ही घर के आंगन, छत और दरवाजों पर मिट्टी के दीये सजाए जाते थे। पड़ोसियों के घर जाना, मिठाइयाँ बाँटना और दोस्तों के साथ पटाखे चलाना त्योहार की सबसे खूबसूरत यादों में शामिल था। उस समय न महंगी सजावट की जरूरत थी और न ही किसी को सोशल मीडिया पर अपनी खुशी दिखाने की चिंता। छोटी-छोटी चीजों में ही बड़ी खुशियाँ मिल जाती थीं।
लेकिन अब दिवाली का अंदाज बदल चुका है। मिट्टी के दीयों की जगह रंग-बिरंगी LED लाइट्स और डिजाइनर झालरों ने ले ली है। घर की सजावट के लिए लोग इंटरनेट पर नए-नए आइडियाज खोजते हैं, ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं और दिवाली से पहले ही गिफ्ट्स की लंबी लिस्ट तैयार कर लेते हैं। अब त्योहार की खुशी के साथ एक खूबसूरत फोटो खींचने और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करने का उत्साह भी जुड़ गया है। मिठाइयों की जगह चॉकलेट बॉक्स और प्रीमियम गिफ्ट हैम्पर्स का चलन बढ़ रहा है। यानी दिवाली अब सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि एक बड़ा सेलिब्रेशन भी बन गई है।

लेकिन इस चमक-दमक के बीच एक सवाल जरूर उठता है—क्या हम दिवाली मनाने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि दिवाली को महसूस करना ही भूल गए हैं?
आज परिवार के सभी सदस्य एक ही घर में होते हुए भी कभी मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, तो कभी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों में। पहले जहाँ लोग एक-दूसरे के घर जाकर गले मिलते थे, वहीं अब कई बार एक WhatsApp मैसेज ही शुभकामनाओं के लिए काफी हो जाता है। पहले घर में बनी मिठाइयों का स्वाद रिश्तों में मिठास घोलता था, जबकि आज बाजार की चमक-दमक ने काफी जगह ले ली है। इसके अलावा, पटाखों से होने वाला प्रदूषण भी दिवाली की खुशियों के साथ एक बड़ी चिंता बन गया है।

हालाँकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि आज की दिवाली खूबसूरत नहीं है। आधुनिक सजावट, ऑनलाइन गिफ्टिंग और नई परंपराएँ भी त्योहार को एक नया रूप दे रही हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि हम आधुनिकता के साथ अपनी पुरानी परंपराओं को भी संभालकर रखें। इस बार LED लाइट्स के साथ कुछ मिट्टी के दीये भी जलाएँ, बाजार की मिठाइयों के साथ घर का कोई पसंदीदा पकवान बनाएँ और सोशल मीडिया पर शुभकामनाएँ भेजने के बजाय कुछ अपनों से मिलकर उन्हें गले भी लगाएँ।
आखिर दिवाली का असली मतलब क्या है?

शायद दिवाली पहले भी उतनी ही खूबसूरत थी और आज भी उतनी ही खूबसूरत है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले खुशियाँ छोटी-छोटी चीजों में मिलती थीं और आज हम उन्हें बड़ी-बड़ी तैयारियों में ढूँढ़ने लगे हैं। त्योहार का असली आनंद न महंगी लाइटों में है, न महंगे तोहफों में और न ही दिखावे में। असली खुशी तो उस मुस्कान में है जो किसी जरूरतमंद की मदद करने से आती है, उस अपनापन में है जो परिवार के साथ बैठने से मिलता है और उस सुकून में है जो अपनों के बीच होने से मिलता है।

तो इस दिवाली सिर्फ अपने घर को ही नहीं, अपने रिश्तों को

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