किराए से विरासत तक अब नाबालिग बेटे की स्थिति भी सवालों में
हरदोई : कोतवाली शहर क्षेत्र के मोहल्ला सुभाष नगर से जुड़े किराए से कब्जे तक पहुंचे प्रकरण में अब मामला और अधिक गंभीर होता नजर आ रहा है। मृतक अश्वनी कुमार के भाई अरुण कुमार अग्निहोत्री द्वारा लगाए गए आरोपों के बीच प्रशासनिक बयानों और नाबालिग बच्चे की स्थिति ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
पीड़ित के अनुसार, जिस महिला को मृतक के मकान में किराए पर रहने दिया गया था, उसने मात्र कुछ ही समय के भीतर स्वयं को मृतक की पत्नी बताते हुए राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज करा लिया। यह प्रक्रिया उस समय पूरी हुई, जब उत्तराधिकार से जुड़ा मामला न्यायालय में विचाराधीन है। पीड़ित का कहना है कि संबंधित महिला पहले से विवाहित है और इसका पुख्ता प्रमाण उसके पास मौजूद है।
इस बीच उप जिलाधिकारी सदर का बयान सामने आया है। एसडीएम सदर का कहना है कि पीड़ित हाईकोर्ट गया है और उन्होंने हाईकोर्ट को अपना जवाब भेज दिया है। महिला के संबंध में यह कहा गया कि उसने मृतक से शादी की थी और इसके समर्थन में उसने फोटोग्राफ दिखाए हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि महिला ने मृतक की सेवा की, इसलिए उसका अधिकार बनता है, उत्तराधिकार बन गया और विरासत तय हो गई।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या किसी की सेवा करना उत्तराधिकार का कानूनी आधार बन सकता है। कानून के जानकारों का मानना है कि उत्तराधिकार तय करने के लिए वैध वैवाहिक संबंध या विधिक दस्तावेज आवश्यक होते हैं। यदि महिला पहले से विवाहित थी, तो ऐसे में दूसरा विवाह कानून की नजर में शून्य माना जाएगा। फिर विरासत और अधिकार का आधार किस नियम के तहत बना, यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है।
मामले का एक और गंभीर पहलू मृतक के नाबालिग बेटे से जुड़ा है। पीड़ित का कहना है कि मृतक के दो नाबालिग बच्चों में से एक बच्चे की वर्तमान स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है। न तो यह साफ है कि बच्चा किसके संरक्षण में है और न ही यह कि उसकी सुरक्षा, देखभाल और शिक्षा की जिम्मेदारी कौन निभा रहा है। परिवार का आरोप है कि बच्चे को जानबूझकर उनसे अलग रखा गया है।
जब यह विषय उठाया गया तो नाबालिग बच्चे की स्थिति को लेकर अब तक कोई ठोस या स्पष्ट प्रशासनिक बयान सामने नहीं आया है। जबकि मामला सीधे तौर पर बाल संरक्षण और नाबालिग के हितों से जुड़ा हुआ है।
पीड़ित द्वारा न्यायालय में धारा 173 (4) के तहत प्रार्थना पत्र दाखिल किया जा चुका है, जो फिलहाल विचाराधीन है। साथ ही जिलाधिकारी और मुख्यमंत्री को भी दस्तावेजों सहित प्रार्थना पत्र भेजे जा चुके हैं। बावजूद इसके, राजस्व रिकॉर्ड, उत्तराधिकार और नाबालिग बच्चे के संरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।
अब यह सवाल आमजन के बीच उठने लगा है कि जब मामला न्यायालय में है, तो क्या प्रशासनिक स्तर पर विरासत को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित है। साथ ही नाबालिग बच्चे की स्थिति पर खामोशी क्या किसी बड़ी चूक की ओर इशारा कर रही है।
फिलहाल मामला हाईकोर्ट, जिला प्रशासन और न्यायालय तीनों स्तरों पर लंबित है। निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच और निर्णय कानून के दायरे में होंगे या फिर यह प्रकरण केवल बयानों और फाइलों तक सिमट कर रह जाएगा।
रिपोर्टर : सी वी आजाद

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