सर्दी में शासन-प्रशासन और समाजसेवियों से अपेक्षा

हरदोई - सर्दी का मौसम शुरू होते ही सबसे अधिक परेशानी उन लोगों को झेलनी पड़ती है,जिनके पास न पक्की छत होती है और न ही ठंड से बचाव के पर्याप्त साधन। शहर के फुटपाथों, बस स्टैंड,रेलवे स्टेशन और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर रहने वाले लोग हर साल इस मौसम में सबसे अधिक असुरक्षित स्थिति में नजर आते हैं। शासन-प्रशासन की ओर से अलाव जलाने, कंबल वितरण और रैन बसेरों की व्यवस्था किए जाने के दावे किए जाते हैं। वहीं सामाजिक संगठनों और समाजसेवियों द्वारा भी मानवीय आधार पर सहयोग के प्रयास सामने आते हैं, जो सराहनीय हैं। हालांकि, यह भी देखा जाता है कि कई बार ये व्यवस्थाएं और सेवाएं शुरुआती दिनों तक ही सीमित रह जाती हैं, जबकि ठंड पूरे मौसम बनी रहती है। कई स्थानों पर अलाव एक-दो दिन जलने के बाद बंद हो जाते हैं। कंबल वितरण की सूची और औपचारिकताएं पूरी हो जाती हैं, लेकिन यह सवाल बना रहता है कि क्या जरूरतमंदों को पूरे सर्दी के मौसम में लगातार राहत मिल पा रही है। ठंड किसी एक कार्यक्रम से समाप्त नहीं होती और फुटपाथ पर रहने वालों की परेशानी भी एक दिन की मदद से खत्म नहीं होती। विशेषज्ञों का मानना है कि शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी केवल निरीक्षण और कागजी रिपोर्ट तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि व्यवस्थाओं की निरंतर निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है। वहीं समाजसेवियों से भी अपेक्षा है कि सेवा कार्यों को केवल एक दिन या प्रचार तक सीमित न रखकर, पूरे मौसम जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाई जाए। फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाला व्यक्ति किसी आंकड़े का हिस्सा नहीं, बल्कि एक संवेदनशील इंसान है,जो न तो अपनी पीड़ा दर्ज करा पाता है और न ही किसी से सवाल पूछने की स्थिति में होता है। उसकी मदद दिखावे से अधिक निरंतर संवेदना की मांग करती है। यदि शासन-प्रशासन की व्यवस्था और समाजसेवियों की मानवीय पहल साथ मिलकर निरंतर रूप से काम करें, तो सर्दी के इस कठिन मौसम में जरूरतमंदों को वास्तविक राहत मिल सकती है। यही सामाजिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी की सच्ची कसौटी भी मानी जाएगी।

रिपोर्टर - सी वी आजाद

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