Harish Rana केस: इच्छामृत्यु कैसे होती है, क्या मरीज को होता है दर्द? एक्सपर्ट से जानें पूरा सच
पूरा देश इस समय एम्स में हरीश राणा की ओर निगाहें गड़ाए हुए है, जो अपने अंतिम समय में हैं। गाजियाबाद के 13 साल के लंबे इंतजार के बाद, जब माता-पिता ने बेटे की हालत देखकर समझा कि इलाज से सुधार की संभावना नहीं है, तो उन्होंने इच्छामृत्यु (Euthanasia) के लिए अनुरोध किया। इस घटना ने देश भर में भावनाओं की लहर पैदा कर दी। लोग हरीश के माता-पिता के दर्द को महसूस कर रहे हैं और हरीश की हालत पर गहरी संवेदना जता रहे हैं।

हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत रखा गया है। इसका मतलब है कि उसे धीरे-धीरे जीवनसहायक दवाओं, आहार और जल जैसी चीज़ें रोक दी जा रही हैं। यह सबसे संवेदनशील प्रक्रिया होती है, जिससे मरीज को सम्मानजनक तरीके से अंतिम समय तक पहुंचाया जा सके।
इस प्रक्रिया को लेकर अक्सर लोगों के मन में सवाल उठते हैं क्या इससे हरीश को दर्द हो रहा है? और पैसिव यूथेनेशिया क्यों चुना गया? दरासल, यूथेनेशिया का तरीका मेडिकल बोर्ड तय करता है, जिसमें मरीज की हालत, उनकी इच्छा और परिवार की सहमति को ध्यान में रखा जाता है।

गंभीर और लाइलाज बीमारियों में इच्छामृत्यु हमेशा से कानूनी, मेडिकल और नैतिक बहस का विषय रहा है। जब मरीज की स्थिति ऐसी हो कि ठीक होने की उम्मीद बहुत कम हो, तब डॉक्टर यह तय करते हैं कि एक्टिव यूथेनेशिया (सीधे इंजेक्शन या दवा से मृत्यु) या पैसिव यूथेनेशिया (जीवन बढ़ाने वाली चीज़ों को रोककर धीरे-धीरे मृत्यु) अपनाई जाए। भारत में फिलहाल एक्टिव यूथेनेशिया अवैध है, इसलिए ज्यादातर मामलों में पैसिव तरीका अपनाया जाता है।
एक्टिव बनाम पैसिव यूथेनेशिया
निर्णय सिर्फ मरीज की मेडिकल स्थिति पर नहीं, बल्कि कानून, लिविंग विल और परिवार की सहमति पर भी निर्भर करता है। पैसिव यूथेनेशिया में लाइफ सपोर्ट हटाना, फीडिंग ट्यूब बंद करना या जीवन बढ़ाने वाली दवाओं को रोकना शामिल होता है। एक्टिव यूथेनेशिया में सीधे मृत्यु का कारण बनती दवा या इंजेक्शन दी जाती है, जो भारत में कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है।
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“मेडिकल साइंस में ‘आसान’ शब्द सही नहीं है,” “हमारा उद्देश्य मरीज के दर्द को कम करना है, प्रक्रिया को आसान बनाना नहीं। पैसिव यूथेनेशिया में मरीज को पेलिएटिव केयर दी जाती है दर्द निवारक दवाएं, मानसिक आराम और सेडेटिव के जरिए। इससे मरीज पूरी तरह आराम में रहता है।”
क्या पैसिव यूथेनेशिया दर्दनाक होती है?
सवाल उठता है कि जीवनसहायक चीज़ें हटाने पर मरीज दर्द महसूस करता है या नहीं।सही पेलिएटिव केयर के साथ यह प्रक्रिया दर्द रहित होती है। मरीज को लगातार मॉनिटर किया जाता है, जरूरत पड़ने पर मॉर्फिन जैसी दवाओं से राहत दी जाती है। बीमारी की अंतिम अवस्था में शरीर की संवेदनशीलता भी कम हो जाती है, जिससे दर्द का अनुभव और भी कम हो जाता है।
‘किलिंग’ और ‘लेटिंग डाई’ का अंतर
यूथेनेशिया पर सबसे बड़ी बहस यह है कि क्या इसे मरने देना और मारना अलग है। पैसिव यूथेनेशिया में डॉक्टर सीधे मौत का कारण नहीं बनते, बल्कि प्राकृतिक प्रक्रिया को होने देते हैं। एक्टिव में सीधा योगदान होता है। मेडिकल दृष्टिकोण से इरादा (Intention) सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि उद्देश्य मरीज की पीड़ा कम करना है और सभी कानूनी नियमों का पालन किया गया है, तो इसे मानवीय निर्णय माना जाता है।
हरीश राणा केस: भूख, प्यास और दर्द
हरीश जैसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि क्या मरीज भूख, प्यास या दर्द महसूस करता है। पैसिव यूथेनेशिया के दौरान मरीज की पूरी देखभाल पेलिएटिव केयर टीम करती है। जरूरत पड़ने पर आईवी फ्लूइड, माउथ केयर और सेडेटिव दिए जाते हैं। दर्द होने पर स्ट्रॉन्ग पेनकिलर से राहत दी जाती है, जिससे मरीज को कोई असुविधा नहीं होती।
क्या यह लंबी और कष्टदायक प्रक्रिया है?
पैसिव यूथेनेशिया में मृत्यु तुरंत नहीं होती। यह कुछ दिन या हफ्तों तक चल सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मरीज पूरे समय दर्द में रहता है। सही चिकित्सा सहायता के साथ उसे अधिकतम आराम दिया जाता है।

अंततः, यूथेनेशिया सिर्फ एक मेडिकल फैसला नहीं है, बल्कि कानूनी और नैतिक संतुलन का विषय भी है। चाहे एक्टिव हो या पैसिव, उद्देश्य हमेशा एक ही रहता है मरीज को गरिमा और कम से कम दर्द के साथ अंतिम समय तक पहुंचाना। हरीश राणा जैसे मामलों में यही प्रयास किया जाता है कि अंतिम समय सम्मानजनक और शांतिपूर्ण हो।

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