जेडीयू ने काटा टिकट, राष्ट्रपति ने थामी उंगली; हरिवंश की तीसरी पारी शुरू!

कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल है, जहाँ आखिरी गेंद पर भी बाजी पलट सकती है। कुछ ऐसा ही हुआ है राज्यसभा के निवर्तमान उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह के साथ। कल तक जिनकी विदाई के पोस्टर छप रहे थे, जिनके संसदीय करियर पर पूर्णविराम लगने की बातें हो रही थीं, आज उन्होंने उसी 'पावर गेम' में ऐसी वापसी की है कि सब दंग रह गए हैं। बिहार की सियासत से लेकर दिल्ली के लुटियंस जोन तक सिर्फ एक ही चर्चा है, और वो है 'हरिवंश फिर से आ रहे हैं!' न नीतीश की जेडीयू का टिकट मिला, न चुनाव के झमेले में पड़े, सीधे महामहिम राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से हरिवंश की उच्च सदन में एंट्री हुई है। चलिए, आपको बताते हैं इस सियासी घटनाक्रम की पूरी कहानी।

दरअसल, कहानी शुरू होती है कुछ दिनों पहले से, जब बिहार में राज्यसभा की सीटों के लिए बिसात बिछी थी। कयास थे कि नीतीश कुमार अपने करीबी हरिवंश को फिर से राज्यसभा भेजेंगे। लेकिन सबको चौंकाते हुए जेडीयू ने हरिवंश का टिकट काट दिया। खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा जाने की तैयारी में दिखे और रामनाथ ठाकुर को दोबारा मौका मिला। राजनीतिक पंडितों ने हरिवंश की विदाई की स्क्रिप्ट लिख दी थी। 10 अप्रैल यानी आज उनका कार्यकाल खत्म हो रहा था। लेकिन तभी राष्ट्रपति भवन से एक ऐसी चिट्ठी निकली जिसने पूरी तस्वीर बदल दी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 80 की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए हरिवंश को राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया है। जिसके बाद हरिवंश नारायण सिंह अब पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की खाली हुई सीट पर नजर आएंगे। 

गौर करने वाली बात यह है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके योगदान और उनकी निष्पक्ष छवि ने उन्हें राष्ट्रपति कोटे का हकदार बनाया है। अब सदन में वह किसी पार्टी के बंधन में बंधे निर्वाचित सदस्य नहीं, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा नामित एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व के रूप में बैठेंगे। यह उनके संसदीय करियर की तीसरी पारी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब यही है। हरिवंश 2018 और फिर 2020 में राज्यसभा के उपसभापति चुने गए थे। अब जबकि वह फिर से सदन का हिस्सा बन गए हैं, तो नियम कहते हैं कि वह दोबारा उपसभापति बन सकते हैं। सदन की कार्यवाही चलाने का उनका अनुभव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर विपक्षी नेताओं तक में उनकी स्वीकार्यता उन्हें इस पद का सबसे मजबूत दावेदार बनाती है। उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन के साथ अब हरिवंश की जोड़ी फिर से सदन की मर्यादा को संभालती नजर आ सकती है।

आपको बता दें हरिवंश की शख्सियत किसी फिल्मी नायक से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश के बलिया की मिट्टी से निकले इस पत्रकार ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षा ली और 'प्रभात खबर' जैसे अखबार के जरिए पत्रकारिता में अपनी धाक जमाई। दिलचस्प किस्सा तो यह है कि उन्होंने ही अपने अखबार में नीतीश कुमार की तुलना चंद्रगुप्त मौर्य से की थी। 2014 में नीतीश ने उन्हें राजनीति में मौका दिया, लेकिन आज उनकी अपनी काबिलियत ने उन्हें उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहाँ दल पीछे छूट गए और उनकी संसदीय गरिमा जीत गई। इतना ही नहीं राज्यसभा में जब हंगामा होता है, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तलवारें खिंचती हैं, तब एक शांत आवाज गूंजती है कि 'माननीय सदस्य, कृपया शांत हो जाइए।' यही हरिवंश की पहचान है। उन्होंने शोर-शराबे के बीच सदन को चलाना और हर सदस्य को बोलने का मौका देना अपनी कार्यशैली बना लिया है। यही वजह है कि उनकी वापसी ने न केवल जेडीयू बल्कि बीजेपी और अन्य दलों के बीच भी एक नई हलचल पैदा कर दी है।

देखा जाए तो हरिवंश नारायण सिंह की यह वापसी केवल एक सीट का भरना नहीं है, बल्कि यह एक संदेश है कि राजनीति में अनुभव और विश्वसनीयता की कीमत हमेशा रहती है। जहाँ एक तरफ नीतीश कुमार की केंद्रीय कैबिनेट में एंट्री की चर्चाएं गर्म हैं, वहीं दूसरी तरफ हरिवंश का मनोनीत होना दिल्ली के सत्ता समीकरणों में एक बड़ी कड़ी है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या हरिवंश तीसरी बार उपसभापति बनकर इतिहास रचते हैं या सदन में एक नई भूमिका में दिखेंगे। लेकिन एक बात तो तय है कि आज 10 अप्रैल को खत्म होने वाली पारी अब एक नई ऊर्जा के साथ 2032 तक खिंच गई है। 

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