हरिवंशराय बच्चन: शब्दों में जीवित एक आत्मस्वीकार

आज हरिवंशराय बच्चन की पुण्यतिथि है। हिंदी कविता को जन-जन तक पहुँचाने वाले इस महान कवि ने जीवन, संघर्ष, पीड़ा और स्वीकार को शब्द दिए। वे केवल मधुशाला के कवि नहीं थे, बल्कि आत्ममंथन और आत्मस्वीकार के भी कवि थे।

बच्चन जी का जीवन उपलब्धियों से भरा रहा, फिर भी उनकी कविता में एक गहरा आत्मालोचन दिखाई देता है। यही संवेदना उन्हें आम मनुष्य के सबसे निकट ले आती है। 

उनकी पुण्यतिथि पर उनकी यह मार्मिक कविता उन्हें स्मरण करने का सबसे सशक्त माध्यम बन जाती है—

मैं जीवन में कुछ कर न सका!

मैं जीवन में कुछ कर न सका!
जग में अँधियारा छाया था,

मैं ज्वाला लेकर आया था,
मैंने जलकर दी आयु बिता,
पर जगती का तम हर न सका!

मैं जीवन में कुछ कर न सका!

अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था,
लघु प्याला भी मैं भर न सका!

मैं जीवन में कुछ कर न सका!

बीता अवसर क्या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको
जब मरना था तब मर न सका!

आज उनकी पुण्यतिथि पर यही पंक्तियाँ हमें याद दिलाती हैं कि हरिवंशराय बच्चन आज भी हमारे मन के सबसे गहरे कोनों में जीवित हैं।

शब्दों से अमर हुए इस कवि को विनम्र नमन।

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