महिलाएं नहीं खा सकतीं मंदिर का प्रसाद! हाथीखेदा मंदिर की अनोखी परंपरा
क्या आपने कभी सोचा है कि किसी मंदिर में प्रसाद तो चढ़े, पर महिलाओं के उसे खाने पर पूरी तरह पाबंदी हो? ऐसा मंदिर है, जहां देवी-देवता नहीं...बल्कि हाथी की पूजा होती है? जी हां, दलमा की पहाड़ियों के बीच बसे इस मंदिर में परंपरा ऐसी है कि यहां चढ़ने वाला प्रसाद महिलाएं न तो खा सकती हैं और न ही घर ले जा सकती हैं। आखिर इसके पीछे क्या सदियों पुराना रहस्य है, जिसका जवाब खुद वहां के पुजारियों के पास भी नहीं है? लेकिन कहा जाता है कि पुराने समय में जब जंगली हाथियों का आतंक गांव वालों की नींद उड़ा देता था, तब बचाव के लिए यहां हाथियों की मिट्टी की मूर्ति पूजी गई थी और तब से यहां चमत्कार का सिलसिला चल पड़ा।
दरअसल, झारखंड की लौह नगरी जमशेदपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर, पूर्वी सिंहभूम जिले के बोड़ाम प्रखंड में बसा है एक ऐसा धार्मिक स्थल, जो अपनी अनोखी परंपराओं के कारण लोगों का ध्यान खींचता है। नाम है...हाथीखेदा मंदिर। अब जरा सोचिए...आमतौर पर मंदिर का नाम लेते ही हमारे दिमाग में देवी-देवताओं की मूर्तियां आती हैं। लेकिन यहां मामला थोड़ा अलग है। यहां हाथी की पूजा की जाती है। जी हां मंदिर परिसर में हाथियों की कई मूर्तियां दिखाई देती हैं और आसपास का पूरा इलाका प्राकृतिक सुंदरता से घिरा हुआ है। एक तरफ पहाड़...दूसरी तरफ घने जंगल...और इन्हीं जंगलों में हाथियों का बसेरा। दरअसल, यह इलाका दलमा के जंगलों और पहाड़ियों के आसपास आता है। दलमा क्षेत्र हाथियों के लिए जाना जाता है। कभी-कभी जंगल से हाथियों के झुंड निकलकर गांवों और खेतों तक पहुंच जाते हैं। फसलें बर्बाद होती हैं...घरों को नुकसान पहुंचता है...और इंसानों तथा हाथियों के बीच टकराव की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। लेकिन अब जरा इस मंदिर से जुड़ी कहानी सुनिए...स्थानीय
मान्यता के मुताबिक, पुराने समय में इस इलाके में हाथियों का काफी आतंक था। हाथियों के झुंड जंगल से निकलकर खेतों और गांवों में पहुंच जाते थे। कहा जाता है कि इसी परेशानी के बीच ग्रामीणों और पुजारियों ने मिट्टी से हाथियों की मूर्तियां बनाकर उनकी पूजा शुरू की। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, इसके बाद हाथियों का उत्पात कम हुआ। वहीं इस मंदिर की एक और परंपरा आपको चौंका सकती है। दरअसल, स्थानीय जानकारी के मुताबिक, यहां मन्नत पूरी होने पर चुनरी और नारियल चढ़ाने के साथ भेड़ की बलि देने की परंपरा भी है। बलि के बाद मांस का कुछ हिस्सा मंदिर में चढ़ाने और बाकी को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की स्थानीय परंपरा बताई जाती है। लेकिन ये प्रसाद महिलाएं नहीं खा सकतीं। बताया जाता है कि मंदिर का प्रसाद घर ले जाने की भी अनुमति नहीं है। स्थानीय पुजारियों का कहना है कि यह नियम उनके पूर्वजों के समय से चला आ रहा है। और यही बात इस मंदिर को और रहस्यमयी बना देती है।
ऐसे में अगली बार आप झारखंड के दलमा इलाके का नाम सुनें...तो सिर्फ जंगल और हाथियों की कल्पना मत कीजिएगा। याद रखिएगा...इन्हीं जंगलों के बीच एक ऐसा मंदिर भी है, जहां हाथी देवता हैं। क्या आपको इस मंदिर के बारे में पता था? हमे जरूर बताइएगा। फिलहाल और ऐसी ही अनसुनी...अनोखी और हैरान कर देने वाली कहानियां हम आपके लिए लेकर आते रहेंगे।
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